बिहारी पहचान 18 : नवरात्रि में नगर भ्रमण करती हैं नगर रक्षिका छोटी पटनदेवी

भारत में कुल 51 शक्तिपीठ है. इसमें पटना की छोटी पटनदेवी का भी अपना महत्वपूर्ण स्थान है. पटना में दो पटनदेवी के दो मंदिर हैं. छोटी पटनदेवी और बड़ी पटनदेवी.

बताया जाता है कि  भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के टुकड़े करने शुरु किए तो उनकी दक्षिण जंघा इसी स्थान पर गिरा था, तब से लेकर आज तक छोटी पटनदेवी लाखों लोगों की आस्था और भक्ति का केंद्र हैं.

प्राचीन पाटलीपुत्र से लेकर आधुनिक पटना में छोटी पटनदेवी की प्रतिष्ठा नगर रक्षिका के रुप में हैं. यहां देवी के स्वरुप को सर्वानंदकारी माना जाता है. इन्हें भगवती पटनेश्वरी भी कहा जाता है. स्थानीय लोग हर मंगलकारी कार्य के बाद आर्शीवाद लेने वाले मां के दरबार में जरुर हाजिरी लगाते हैं.

यहां के महानिशा पूजा की विशेष महत्ता है. लोक आस्था है कि नवरात्रि में में अष्टमी की  राज 12 बजे महानिशा पूजा के बाद पट खुलते हीं आरती होने के बाद तत्काल दर्शन करने पर देवी से मांगी हुई हर मनोकामना पूर्ण होती है. लोक आस्था है कि नगर रक्षिका पटनदेवी दुर्गा पूजा के दौरान अपने नगर का भ्रमण भी करती हैं.

यूं तो छोटी पटनदेवी सालों भर देवी भक्तों की श्रद्धा का केंद्र बना रहता है किन्तु नवरात्रि के समय में यहां लाखों लोग पहुंचते हैं और दर्शन कर अपना जीवन सफल बनाते हैं. दशहरे के दिनों की दर्शन करने वाले भक्तों की भीड़ एक किलोमीटर से भी ज्यादा लंबी हो जाती है.

पुजारी आचार्य अभिषेक अनंत द्विवेदी कहते हैं. नवरात्र के दौरान महाष्टमी और नवमी को पटन देवी के दोनों मंदिरों में हजारों श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए आते हैं. महासप्तमी को महानिशा पूजाए अष्टमी को महागौरी और नवमी को सिद्धिदात्री देवी के पूजन के बाद हवन और कुमारी पूजन में बड़ी भीड़ जुटती है. दशमी तिथि को अपराजिता पूजन, शस्त्र पूजन और शांति पूजन किया जाता है.

यहां की पूजा पद्धति भी परंपरागत तरीके से होती है. सार्वजनिक रुप से जहां वैदिक विधि विधान से पूजा होती है तो वहीं पट बंद कर कुछ देर के लिए तांत्रिक अनुष्ठान भी होता है. इसमें मंदिर के महंत और पुजारी के अलावा किसी के जाने की अनुमति नहीं होती. इस स्थान को कालिका मंत्र सिद्धि के लिए भी जाना जाता है.

छोटी पटनदेवी मंदिर में बली प्रथा कायम है. अष्टमी और नवमी तिथि को सूर्योदय के पश्चात बली दी जाती है. यहां के बुजुर्गों का कहना है कि सम्राट अशोक के शासनकाल में यह मंदिर काफी छोटा थाण् इस मंदिर की मूर्तियां सतयुग की बताई जाती हैं. मंदिर परिसर में ही योनिकुंड है, जिसके विषय में मान्यता है कि इसमें डाली जाने वाली हवन सामग्री भूगर्भ में चली जाती है. देवी को प्रतिदिन दिन में कच्ची और रात में पक्की भोज्य सामग्री का भोग लगता है.

छोटी पटनदेवी मंदिर में महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती की उपासना एक साथ होती है. मंदिर के पीछे एक पटनदेवी खंदा है. मान्यता है कि तीनों देवियों की प्रतिमा इसी खंदे यानी गड्ढे से हीं अवतरित हुई थीं.

कैसे पहुंचे मंदिर
अशोक राजपथ मार्ग में गायघाट से अनुमंडल कार्यालय  की ओर बढऩे पर बीच में दाहिनी ओर बड़ी पटन देवी का बड़ा द्वार  है. लगभग आधा किलोमीटर पैदल या वाहन से मंदिर तक पहुंचा जा सकता है. मंदिर के बाहर हाइमास्ट लाइट लगा है और आगे में चारों ओर फूल माला की दुकानें सजी है.

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सरदार सिमरनजीत सिंह
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जानते तो जरूर होगे मुझे नहीं जानतेे तो कोई बात नहीं अब जान लो........ नाम तो जरूर सुना होगा नहीं सुना तो कोई बात नहीं अब सुन लो..... बिहारी हूं, अपनी धुन में रहता हूं धुन का पक्का नहीं पर मन का सच्चा हूं. पत्रकारिता और लेखन शौक है. बिहार के सासाराम का रहने वाला हूं,

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