बिहारी पहचान हमारी शान 13 : प्रखर पत्रकार, रवीश कुमार

वर्तमान समय में पूरा देश दो भागों में बंटता जा रहा है. एक खास किस्म की विचारधारा का लेकर. इसमें सिर्फ दो पक्ष है, एक जो उसका समर्थक है और दूसरा जो उनका विरोधी है. रवीश कुमार भी भारतीय पत्रकारिता जगत का जाना पहचाना नाम है. रवीश कुमार देश के जाने माने पत्रकार, न्यूज एंकर और ब्लाॅगर हैं. राजनीतिक और सामाजिक विषयों पर रवीश के लेखों को काफी पसंद किया जाता है. इनका अपना एक समर्थक वर्ग है. रवीश उस खास किस्म की विचारधारा के आलोचक माने जाते हैं. रवीश की पत्रकारिता और आलेखों में गांव, किसान, मजदूर मुख्य पात्र होते हैं. ग्राउंड लेवल पर जाकर खेत में काम कर रहे किसानों और मजदूरों से बात करना या लेबर क्लास के अपेक्षाकृत गंदे फुटपाथी दुकानों में जाकर दाल भात खाते खाते रिपोर्टिंग करना लोगों को प्रभावित करता है. रवीश जितनी सादगी और दिलचस्पी से महत्वपूर्ण मुद्दों पर बात कर जाते हैं, वह उन्हें चोटी के अन्य पत्रकारों से अलग कर देता है. रवीश कुमार एनडीटीवी पर रोजाना आने वाले कार्यक्रम प्राइम टाइम के एंकर हैं जिसमें प्रतिदिन अलग अलग ज्वलंत विषयों पर चर्चा होती है. चर्चा के प्रारंभ मंे रवीश अपनी बात कहते हैं. रवीश जब तक बोलते हैं, टीवी का रिमोट थम जाता है.


प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
रवीश का जन्म बिहार के एक ब्राह्मण परिवार में पूर्वी चंपारण जिले के मोतिहारी में 5 दिसंबर 1974 को हुआ था. प्रारंभिक शिक्षा दीक्षा पटना के लोयोला हाई स्कूल में हुई. उच्च शिक्षा के लिए वह दिल्ली चले गएं जहां दिल्ली विश्वविद्यालय के दीनबंधु काॅलेज से ग्रेजुएशन किया. इंडियन इंस्टिट्यूट आॅफ मास कम्युनिकेशन, दिल्ली से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर किया.
पढ़ाई के क्रम में ही रवीश की मित्रता नयना दासगुप्ता से हुई. आगे चलकर रवीश ने अपनी इसी महिला मित्र को अपनी जीवनसंगिनी के रुप में अपना लिया. नयना लेडी श्रीराम काॅलेज में इतिहास की हेड आॅफ डिपार्टमेंट हैं. दो बेटियों के साथ रवीश और नयना अपनी हसीन जिंदगी बिता रहे हैं.


रवीश की किताबें
रवीश कुमार द्वारा रचित तीन मशहूर किताबें हैं, इश्क में शहर होना, देखते रहिए और रवीशपन्ती. इश्क में शहर होना लवस्टोरी है. इस किताब से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि राजनीतिक विषयों पर अपनी राय बेबाकी से रखने में माहिर रवीश कुमार के जीवन में प्रेम का भी महत्व है. पुस्तक समीक्षक यायावर लिखते हैं 

रवीश की कहानियों में प्रेमी जोड़े हैं जो शहर के अलग-अलग कोनो में अपने प्यार को तलाशते हैं, जो अपने महबूब में शहर को देखते हैं. किताब उन प्रेमी जोड़ो की मनः स्थिति दर्शाती है जो शहर के भीड़-भाड़ में अपने प्यार को जीने की जगह तलाशते हैं, मेट्रो के सफ़र के दौरान, ऑटो में बैठे शहर घूमते समय, किसी भीड़-भाड़ वाले बाज़ार में या कॉलेज के गेट के बाहर के रस्ते पर ये जोड़े अपने अपने तरीके से अपने प्यार को मुक्कमल करते नज़र आते हैं. रवीश की ये लाइन इन प्रेम कथाओं पर एकदम सटीक बैठती है “जब आप प्यार में होते हैं तो शहर को ज्यादा अच्छी तरह से समझ सकते हैं और हर छोटे और अंजान कोनों का सम्मान करने लगते हैं”. इन कहानियों में शहर भी उतना ही जिंदादिल है जितना की कहानियों में प्रेम, दोनों को एक दूसरे से जुदा करना मुश्किल है, शहर एक बड़े वृक्ष की तरह अपनी हर शाख पर हज़ारों ऐसे प्रेमी पंछियों को बसेरा दे रहा है जो उसकी शाख पर प्रेम गीत गा रहे हैं. कहानियाँ शहर में होते बदलाव से इन प्रेमियों के जीवन पर होते असर के कई पहलुओं को दिखाती है. 

पिछले 15 सालों से एनडीटीवी से जुड़े रवीश कुमार ने अपने कॅरियर में कई अवार्ड्स हासिल किए जिनमें 2013 का रामनाथ गोयनका अवार्ड, 2014 में गणेश शंकर विद्यार्थी अवार्ड और बेस्ट न्यूज एंकर अवार्ड शामिल है. धारा के विपरीत पत्रकारिता करने वाले रवीश कुमार पर सरकारी तंत्र ने कई प्रकार से दबाव बनाने का प्रयास किया पर उन्होेंने तानाशाही का डटकर सामना किया और आज भी अपनी जगह पर कायम है. सही मायनों में रवीश एक बिहारी सब पर भारी की कहावत चरितार्थ करते हैं.

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