बिहार के सभी सांसद अपने अपने क्षेत्र से गायब ! कोरोना, बाढ़, बेरोजगारी सब एक साथ !

बिहार और बिहारियों की पीड़ा कोई नहीं समझने वाला. बड़े शौक से बिहार के लोगों ने पिछले लोकसभा चुनाव में बढ़ चढ़ कर मोदी के नाम पर, पुलवामा के नाम पर, बालाकोट के नाम पर, 100 किलो के बम के नाम पर, हिंदुत्व के नाम पर 40 में से 39 सीटें राष्ट्र को समर्पित कर दी थी लेकिन जब संकट का दौर इन बिहारियों पर आया तो कोई उनके साथ खड़ा नजर नहीं आ रहा है.

 

पूरा भारत कोरोना से त्राहिमाम कर रहा है लेकिन व्यथा तो सुनिए बिहारियों की, बिहार कोरोना के साथ साथ बाढ़, बेरोजगारी, बेकारी, अव्यवस्था, कुव्यवस्था, दुर्दशा सब झेल रहा है. भारत के अलग अलग हिस्सों में सर्वाधिक मजदूर बिहार के ही नजर आते हैं. काम धंधा हर जगह से उजड़ चुका है. मजबूरी में सबको वापस बिहार अपने घर, अपने गांव लौटना पड़ा है. लोग बेरोजगारी की विभीषका झेल रहे हैं. खाने तक के लाले पड़ चुके हैं. कोई सुनने वाला नहीं, कोई समझने वाला नहीं.

सरकार डिंग हांकने में व्यस्त है, विपक्ष कमीन निकाले में मस्त है लेकिन जनता बुरी तरह त्रस्त है. दुर्भाग्य तो देखिए बिहारियों का, बिहार की बाढ़ हर साल सैकड़ों को लील जाती है लेकिन इससे बचने का कोई ठोस उपाय तो छोड़ ही दिजिए, किसी की कान पर जूं भी नहीं रेंगती.

ये बिहार का अभिशाप ही है कि जब कोरोना, बाढ़ और बेरोजगारी से त्राहिमाम की स्थिति मची हुई है तो पूरा सरकारी तंत्र विधानसभा चुनाव की तैयारियों में लग चुका है. ये न सिर्फ शर्मनाक है बल्कि पूर्ण रुप से अमानवीय है. आज तो बिहार में स्थिति ऐसी है कि बीमारी कोई भी हो, कोई अस्पताल में एडमिट करने को तैयार नहीं है. अस्पतालों की दुर्दशा से आप रोज वाकिफ हो रहे होंगे.

मोदी के नाम पर सब योग्य, अयोग्य जीत कर दिल्ली पहुंच गए तो दिल्ली के होकर ही रह गए. किसी को अपने क्षेत्र की जनता की कोई फिक्र नहीं है. न तो कोरोना पीड़ितों की, न बाढ़ पीड़ितों की और न हीं बेरोजगारी की. आप भी टेंशन मत लिजिए. व्हाट्सएप्प के मैसेज पढ़िए, उन्हें फॉरवर्ड किजिए और राष्ट्रवादी होने का गौरव प्राप्त कर लिजिए. थोड़ा कष्ट झेल लिजिए. देशभक्तों को कष्ट तो झेलना ही पड़ता है.

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