लफड़े की वजह : सभी दलों को चाहिए ज्यादा से ज्यादा सीटें

बिहार में विधानसभा चुनाव नजदीक है. क्या एनडीए और क्या यूपीए… उलझन सुलझती किसी की नहीं दिखती. एनडीए की मुसीबत लोजपा बढ़ा रही है तो यूपीए की जीतन राम मांझी की पार्टी हम सेकुलर. मुसीबत की सबसे बड़ी वजह है सीटों का बंटवारा. कोई भी दल पिछले विधानसभा चुनाव से बाहर नहीं निकल रहा है. सभी को ज्यादा से ज्यादा सीटें चाहिए, बस पेंच वहीं पर फंस रहा है. भाजपा और जदयू हो या राजद और कांग्रेस, सीटों का मामला अब तक कहीं भी क्लियर नहीं है.

जदयू ने झटक ली थी ज्यादा सीटें

2014 के लोकसभा चुनाव में जदयू को महज 02 लोकसभा सीट मिली थी और भाजपा को 22 लेकिन 2019 में जदयू ने 17 सीटों पर चुनाव लड़ा जिनमें 16 सीटों पर उन्हें जीत भी मिली. अब बारी जदयू को देने की है. अगर जदयू भाजपा को 100 सीट देने पर राजी हो भी गया तो भाजपा अपने पिछले 57 उम्मीदवारों को कहां एडजस्ट करेगी, ये बड़ा सवाल है. भाजपा चाहती है कि 100 सीटों पर जदयू लड़े और 100 पर भाजपा. बाकी बची हुई 43 सीटें लोजपा को दे दी जाए. जदयू इसके लिए तैयार नहीं है. जदयू स्वयं 125 सीटों पर चुनाव लड़ने की चाहत रखता है. इसके बाद बची सीटे या तो भाजपा खुद ले ले या सहयोगियों के साथ बांट ले. बस एनडीए का विवाद यहीं से शुरु हो जाता है.

राजद को 160 सीटों पर लड़ना है

वहीं बात करें महागठबंधन यानी यूपीए की तो यहां सबसे बड़े दल राजद को खुद ही 150 सीटों पर चुनाव लड़ना है. पिछली बार राजद 100 सीटों पर लड़ा था. बाकी की 93 सीटों को वो सहयोगियों में बांटना चाहता है. कांग्रेस पिछली बार 40 सीटें मिली थी, इस बार 80 की चाहत है. मांझी से किनारा करने का बहाना खोजा जा रहा है. यूपीए को उपेंद्र कुशवाहा को संतुष्ट करने की जिम्मेवारी होगी. मुकेश सहनी पर कोई बात ही नहीं हो रही है. सीटों के एडजस्टमेंट में जो गठबंधन सक्रियता दिखाएगा, वही शुरुआती दौर में बढ़त लेता हुआ दिखाई देगा क्योंकि लड़ाई कांटे की होगी.

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