पुष्पम प्रिया बिना शोर और हल्ला मचाये बिहार के युवाओं में लोकप्रिय हो रही है, नेताओं को तकलीफ क्यों

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पुष्पम प्रिया चौधरी यह नाम 8 मार्च से पहले शायद ही कोई जनता था. लेकिन 8 मार्च की सुबह बिहार में हर किसी के जुबान पर पुष्पम प्रिया का नाम आ चूका था. उस दिन अखबारों के पहले पन्ने पर बिहार विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले इनके द्वारा बनाई गयी Plurals पार्टी के बड़े-बड़े ऐड छपे थे. पुष्पम प्रिया अखबारों के जरिये बिहार के हर घर में पहुँच चुकी थी और 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव के लिए खुद को मुख्यमंत्री उम्मीदवार होने की उद्घोषणा कर रही थी.

बिहार विधानसभा चुनाव से ठीक पहले किसी युवा बिहारी लड़की का अचानक बिहार की राजनीती में आना बिहार के पुराने नेताओं के लिए किसी सदमे से कम नहीं था. हालाँकि बिहार के किसी भी नेता ने पुष्पम प्रिया को बाहर मीडिया के सामने तवज़्ज़ो कभी भी नहीं दिया. सत्ता में बैठे नितीश कुमार का कोई बयान नहीं आना फिर भी समझ में आता है. लेकिन युवा नेता तेजस्वी यादव ,चिराग पासवान यहाँ तक की बिहार में नई राजनीती शुरू करने की बात करने वाले प्रशांत किशोर भी पुष्पम प्रिया पर चुप ही रहे. लेकिन पार्टी के नाम का एलान करने के बाद पुष्पम प्रिया चुप नहीं है. हां वो मीडिया से बात नहीं करती वो अन्य नेताओं की तरह शोर नहीं मचाती, नितीश कुमार को चुनौती देने वाली पुष्पम प्रिया नितीश सरकार के खिलाफ कोई विरोध मार्च नहीं निकालती और ना ही सड़को पर भीड़ लेकर रैलियाँ करते दिखती है. लेकिन फिर भी बिहार के युवाओं में इनकी लोकप्रियता धीरे-धीरे बढ़ते जा रही है.

पुष्पम प्रिया अभी बिहार के सैर पर है. घूमने वाला या पर्यटन वाला सैर नहीं, खोज करने वाला सैर. उन फैक्ट्रियों की सैर जो पहले कभी बिहार की शान हुआ करते थे, जो बिहारियों को बिहार में ही रोजगार दिया करते थे. बिहार में बर्बाद हो रहे उन बागवानों की सैर जो बिहार को समृद्ध बनाने में अहम् भूमिका निभा सकते थे. उन ऐतिहासिक स्थलों की सैर जिसे देखने और जानने कभी देश के नामी- हस्तियां आया करती थी. उन बेहतरीन बिहारी कलाकारों, शिल्पकारों ,मूर्तिकारों के घरों की सैर जिनके बारे में शायद उनके पोस्ट करने से पहले हम भी नहीं जानते थे.

पुष्पम प्रिया ने हाल में अपने फेसबुक पेज पर एक पोस्ट डाला था वो भारत की वैश्वीकरण की बात करते हुए लिखती है- ” 1991 में भारत खुलता है, ईकोनोमिक रेफ़ोर्म होते हैं, देश ईकोनोमिक सुपरपावर के रास्ते चलता है, इनफ़ोसिस, टीसीएस, विप्रो ग्लोबल हो जाते हैं, सचिन तेंदुलकर दिल में, विश्वनाथन आनंद दिमाग़ में और एआर रहमान आत्मा में बस जाते हैं, वर्ल्ड कप, ऑस्कर ले आते हैं, देश न्यूक्लियर पावर बन जाता है। इसी दौर में बिहार एक अलग रास्ते जाता है। एक सामंती शासन के अंत के बाद जातियों के न्याय और विकास का शासन! इस युग के चार मुख्यमंत्री सहित एक भी नक़ली नेता अगर ‘जस्टिस’ और ‘डेवलपमेंट’ को परिभाषित करने की चेष्टा भी कर दें तो जॉन रॉल्स फिर से मर जाएँगे और अमर्त्य सेन आत्महत्या कर लेंगे ( जानकरी के लिए आपको बता दे की जॉन रॉल्स एक अमेरिकी राजनीतिक दार्शनिक थे जिन्होंने न्याय का सिद्धांत दिया था )। वे आगे शायद मुख्यमंत्री नितीश कुमार पर ऊँगली उठाते हुए लिखती है- वे सामाजिक न्याय का दावा करते हैं, सुशासन की शिलालेख खुदवाते हैं। उधर बिहारी मज़दूर, परीक्षार्थी युवा, छात्र दिल्ली, पंजाब, मुंबई में सरेआम पीटे जाते हैं, ‘बिहारी’ पहले भैया और फिर गाली बन जाता है, बॉलीवुड की फ़िल्मों में बिहारी विलेन और कॉमिक कैरेक्टर बन जाता है और बिहार में सरकारी खर्चे वाली जीडीपी से नक़ली विकास पुरुषों के क़सीदे लिखे जाते हैं। देश के अंदर हंसी के पात्र बना दिए जाने वाले राज्य के गाँवों, क़स्बों और शहरों में खेती, पारम्परिक उद्योग, इंडस्ट्रियल हब और टैलेंट्स अपनी बर्बादी पर रोते हैं और बिहार अपनी क़िस्मत पर सिर धुनता है। क्या बिहार 2020 में खुलेगा, क्या बिहार ग्लोबल बनेगा, क्या बिहार ईकोनोमिक सुपरपावर होगा? यह सब होगा, लेकिन इसके लिए सबसे पहले नक़ली नेताओं का ग्रांड फ़ेयरवेल होगा।

पुष्पम प्रिया की यह बाते किसी भी युवा को अपनी पार्टी और खुद की छवि की तरफ आकर्षित करने के लिए काफी है. इस कोरोना काल में जहाँ युवाओं की नौकरियां छूट रही है वही पुष्पम प्रिया उन्हें बिहार में ही पुरानी बंद परी और बादनसीबी की दौर से गुज़र रही फैक्ट्रियों को शुरू करा लोगों को उनके ही क्षेत्र में रोज़गार देने का वादा करती दिख रही है. किसानों को उच्च तकनीक देने की बात कर रही है. ऐसा नहीं है की वो केवल रोजगार और कृषि की बात करती है। पुष्पम प्रिया बिहार को खेल में भी बेहतर करने की बात करती है शायद पुष्पम प्रिया को क्रिकेट ज्यादा पसंद है क्यों की अक्सर उनकी लिखी बातो में क्रिकेट में इस्तेमाल की जाने वाली शब्दों का इस्तेमाल ज्यादा रहता है. इसके अलावा मछली पालन ,पर्यटन ,बटन उद्योग , बिहार में शिक्षा को बेहतर करने के लिए सरकारी विद्यालयों को बेहतर बनाने से लेकर बिहार के इतिहास को पुनर्जागृत करने की बात करती है पुष्पम प्रिया.

इसमें कोई शक नहीं की जो सपने पुष्पम प्रिया युवाओ को दिखा रही है उसे पूरा करना आसान भी नहीं है. लेकिन यह भी सच है की आसान तो कुछ भी नहीं है. सच यह भी है की बिहार के युवा अब नितीश जी से ऊबने लगे है. वे अब उस विकल्प की तलाश में है जिसके पास उनके कोई विजन हो. पुष्पम प्रिया चौधरी के पास भले ही अभी भीड़ नहीं दिख रही लेकिन वो युवाओ को विजन दिखाने में कामयाब हो रही है. देखना दिलचस्प होगा की जब चुनाव की घोषणा होगी तो वो किस प्रकार की रणनीति अपनाती है.

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