देश का पहला दलित मुख्यमंत्री जिसके परिवार के पास श्राद्ध के पैसे नहीं थे

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बिहारी बेजोड़ के आज के सेगमेंट में बात एक ऐसे व्यक्ति के बारे में जिसे लोग उनकी ईमानदारी के लिए याद करते हैं. उनके बारे में लोग अपने बच्चों को उदाहरण के रूप में बताते है कि बनना है तो ऐसा बनो. लेकिन आज के जमाने में जैसे ही राजनेता शब्द का नाम जवान पर आता है तो लोग कहते हैं ये क्या कह रहे हो. दरअसल हम जिस व्यक्ति के बारे में आपको बताने जा रहे हैं वह व्यक्ति बिहार के तीन बार मुख्यमंत्री रहे हैं. आज राजनेताओं की छवि जिस तरह की ह वह व्यक्ति उससे पूरी तरह से उलट है. उस व्यक्ति के लिए कहा जाता है कि वह सुबह एक बार फिर कब आएगी. सादगी ऐसी कि वे बैठक तक पेड़ के नीचे कर लिया करते थे. जब सोने की बारी आती थी तो वे झोपड़ी में अपनी रात गुजारते थे लेकिन अपने कर्तव्यों से पीछे नहीं हटे. आज हम बात करने जा रहे हैं बिहार के तीन बार मुख्यमंत्री रहे भोला पासवान शास्त्री के बारे में

ये कहानी हैकहानी क्यों, ये तो एक सुखद हकीकत है गुजरे दौर की. उस दौर की जब एक नेता ने ईमानदारी की वो मिसाल कायम की थी जिसकी आज सिर्फ कसमें खाकर ही काम चला लिया जाता है. हो सकता है कि हमारे शब्द कुछ नेताओं को चुभें लेकिन क्या करेंजो सच है वो है. भोला बाबू ने जो जीवन जिया वैसा जीवन जीने के लिए ईमानदारी वाला कलेजा होना चाहिए. भोला पासवान शास्त्री बिहार में तीन बार मुख्यमंत्री बने वे पहली बार साल 1968 में तीन महीने के लिए बिहार के मुख्यमंत्री बने थे उसके बाद साल 1969 में 13 दिनों के लिए बिहार के मुख्यमंत्री बने उसके बाद साल 1971 में सबसे ज्यादा 7 महीने के लिए बिहार के मुख्यमंत्री रहे. लेकिन इस दौरान उन्होंने कमाया तो बस अपना वेतन. हालांकि आज के नेता विधायक के बारे में अगर आप किसी से पुछेंगे कि वह सीधा यही कहते सुनेंगे कि विधायक बन गए हैं अब उनके पास पैसे की बाढ़ आ जाएगी. लेकिन भोला पासवान शास्त्री जब मुख्यमंत्री से हटे तो उनके पास ईमानदारी था, न तो वे पटना के पॉस इलाके में घर था न ही कोई आलीशान बंगला था और न ही कोई नेमप्लेट था जिसमें लिखा हो पूर्व मुख्यमंत्री. इनका आखिरी समय एक झोपड़ी में गुजरा था.

भोला पासवान शास्त्री के अगर हम राजनीतिक सफर के बारे में बात करे तो वे महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित थे. इनका योगदान देश की आजादी में रहा है. बचपन में पढ़ाई लिखाई में अच्छे थे. इनकी शिक्षा दिक्षा बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से हुई है जहां इन्हें शास्त्री की डिग्री मिली थी. यहीं से उन्होंने अपने आप को राजनीति में लाने का फैसला किया था. भोला पासवान का पढ़ना बहुत खास इसलिए भी था क्योंकि वह दलित समाज से आते थे. उस समय के समाज में संस्कृत और कर्मकांडों पर उच्च वर्ण का कब्जा था. ऐसे में बिहार के पूर्णिया से एक दलित समाज का लड़का जब पढ़ने आया तो यह अपने आप में अलग था.

जब वे केंद्र मे मंत्री रहे हो या फिर प्रदेश में मुख्यमंत्री वे पेड़ के नीचे ही अपना काम करते थे. वे नीचे जमीन पर कंबल बिछाकर बैठ जाते थे और वहीं अफसरों के साथ बैठकर कर मामले की सुनवाई भी करते थे. बता दें कि वे इंदिरा गांधी की सरकार में साल 1973 में मंत्री भी बने थे. नवभारत टाइम्स को दिए अपने इंटरव्यू में उस समय के अधिकारियों ने बताया कि जब वे पहली बार भोला पासवान शास्त्री से मिले थे तो उन्होंने लगा ही नहीं था कि मुख्यमंत्री से बात कर रहे हैं. वे सिसायत की मिट्टी से बिल्कुल अलग थे. उनके मन में जातपात की दुर्भावना थी ही नहीं. इस तरह के नेता आज कहा दिखाई देते हैं. बिहार में तीन बार के मुख्यमंत्री आज अपन ईमानदारी के लिए जाने जाते हैं लेकिन आज के राजनेता पैसे के लिए जाने जाते हैं. इसीलिए भोला पासवान शास्त्री का परिवार आज भी उसी झोपड़ी में रह गया जहां बैठकर वे विभाग की फाइलों को देखा करते थे.

भोला पासवान शास्त्री का जन्म पूर्णिया जिले के बैरगाछी में हुआ था. भोला पासवान शास्त्री के ईमानदारी का ही परिणाम है कि आज भी उनका पूरा परिवार एक छप्पर के नीचे रहने को मजबूर है. मीडिया में आए दिन उनकी गरीबी की खबरें मीडिया की सुर्खियां बनती रही है. उनके गांव के लोग बताते हैं कि उन्होंने कभी बहुत अच्छा खाने को लेकर कोई जिद्द या फिर इच्छा नहीं जताई उन्हें जो भी रुका सुखा मिल जाता था वे उसी में खुश हो जाते थे. यही कारण है वे अपने रहन सहन को लेकर हमेशा संजीदा रहा करते थे. ईमानदारी की प्रतिमुर्ती कहे जाने वाले भोला पासवान शास्त्री 9 सितंबर 1984 को इस दुनिया को अलविदा कह गए. इस व्यक्ति की ईमानदारी देखिए जब इनकी मौत हुई तो परिवार के पास श्राद्ध के लिए पैसे नहीं थे.

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