बिहार विधानसभा चुनाव 2020 का बड़ा सवाल, “नीतीश नहीं तो कौन ?”

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पिछले 15 वर्ष से बिहार कि सत्ता कि कुर्सी पर नीतीश कुमार ही बैठे है और जिस तरह से कोरोना काल में भी उनकी पार्टी चुनाव के लिए आतुर दिख रही है उसे देख कर तो यही प्रतीत होता है की 6 बार बिहार के मुख्यमंत्री कि शपथ ले चुके नीतीश कुमार खुद को सपने में सातवीं बार मुख्यमंत्री पद कि शपथ लेते हुए देख रहे है. लेकिन बिहार में कोरोना की वजह से लगे लॉकडाउन एवं फिर बाढ़ के हाहाकार ने बिहार की जनता की ज़िन्दगी में जिस तरह ग़दर मचाया उसे शब्दों में बयां करना मुश्किल हो गया है. लेकिन इसके बावजूद भी बीजेपी के सहयोग से बिहार की सत्ता पर काबिज़ नीतीश कुमार को ऐसा लगता है की बिहार के मुख्यमंत्री की रेस में उनका पलड़ा अभी भी सब पर भारी है.

अब सवाल यह उठता है कि आखिर क्यों एंटी इंकमबेंसी, लगातार बढ़ रही बेरोजगारी, बदहाल शिक्षा व्यवस्था, बदहाल स्वस्थ्य व्यवस्था, कोरोना लॉकडाउन में सबसे ज्यादा कोई रोज़ी-रोटी के लिए तरसा तो वो बिहार के मज़दूर थे, हर साल आने वाले बाढ़ का 15 से सत्ता पर काबिज रहने के बावजूद नीतीश कुमार कोई अब तक निदान नहीं निकाल पाए और इसके अलावे अन्य कई समस्याओं के बावजूद आखिर क्यों बिहार में नीतीश कुमार अब भी मुख्यमंत्री चेहरे की रेस में सबसे आगे नज़र आ रहे है. लेकिन दिलचस्प बात यह हैं कि इस सवाल का जवाब भी एक सवाल ही है कि, “नीतीश नहीं तो कौन ?”

बिहार में नेताओं कि कमी नहीं है.विपक्ष में युवा नेता के तौर पर तेजस्वी यादव है तो दूसरी तरफ बिहार कि राजनीती में उभरते सितारे कन्हैया कुमार है. आज कल गरीबो के मशीहा बने पप्पू यादव भी बिहार की जनता से 5 साल मांग रहे है. इनके अलावे रालोसपा के मुखिया उपेंद्र कुशवाहा भी मन ही मन में नीतीश कुमार कि बराबरी करने कि हसरत पाले हुए है. राजनीती के मार्केट में एक नया नाम पुष्पम प्रिया भी आया हुआ है देखना है की कब तक टिकता है. बीजेपी में भी कई नेता है जो समय-समय पर नीतीश कुमार को किसी ना किसी बहाने कोसते रहते है लेकिन बात जब मुख्यमंत्री कि होती है तो बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व नीतीश कुमार को NDA के चेहरे के तौर पर प्रोजेक्ट करने से पीछे नहीं हटता. क्यों कि उन्हें भी मालूम है नीतीश नहीं तो कौन ?

राजद नेता तेजस्वी यादव को लालू यादव का उत्तराधिकारी के तौर पर देखा जा रहा है. माना जा रहा है कि विपक्षी महागठबंधन से वही बिहार के अगले मुख्यमंत्री के उम्मीदवार होंगे. हालाँकि इसमें मानना क्या है यह तो सच्चाई है. लेकिन क्या विकास पुरुष कहे जाने वाले नीतीश कुमार का विकल्प बन पाना बिहार में इतना आसान है और क्या बिहार की जनता कि नज़रो से राजद के समय का जंगल राज़ ओझल हो पाया है ? ये 2 महत्वपूर्ण बुनियादी सवाल है जो बिहार विधानसभा 2020 के चुनाव में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला है.

हालाँकि इसमें कोई शक नहीं कि नीतीश कुमार अपनी जिस विकासवादी छवि के लिए जाने जाते थे वह अब लगभग धूमिल होती दिखाई दे रहे है. बिहार में पिछले कुछ साल में अपराध का ग्राफ भी बढ़ा है. कोरोना ने तो जैसे बिहार की कमर ही तोड़ दी है. रोज़ काम कर के अपने और अपने परिवार का पेट पालने वालो का भी काम बंद हो चूका है. नीतीश सरकार का इनसे कोई वास्ता नहीं है सरकार ने इन्हे अपने हाल पर छोड़ दिया है. ऑफिस में काम करने वाले और प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाने शिक्षक सभी लॉकडाउन की मार झेल रहे है. कई महीनो से उन्हें कोई सैलेरी नहीं मिली है. लेकिन नितीश सरकार किसी से भेद-भाव नहीं करती. मज़दूरों की तरह इस सरकार का इनसे भी कोई वास्ता नहीं है इनको भी सरकार ने अपने हाल पर छोड़ दिया है. पर सवाल अब भी यही उठता है कि क्या विपक्ष उस भीड़ को वोट में बदल पायेगा. क्या बिहार की जनता नीतीश से आगे सोचने के लिए तैयार हो पाई है ? यही वह सवाल है जो हमें यह पूछने पर मज़बूर कर दे रहा है कि “नीतीश नहीं तो कौन “?

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