देश का पहला चुनाव जिसमें माँगा जा रहा तीस साल का हिसाब

0
221

इस बार का बिहार विधानसभा चुनाव पंद्रह साल बनाम पंद्रह साल के तर्ज पर हो रहा है. आमतौर पर देखा जाता है कि चुनावों में पार्टियाँ पांच सालों का ही हिसाब किताब रखती हैं फिर चाहे वो रूलिंग पार्टी हो या विपक्षी पार्टी. लेकिन बिहार विधानसभा चुनाव देश का शायद पहला ऐसा चुनाव है जिसमें पिछले तीस सालों का हिसाब किताब गिनवाया जा रहा है. रूलिंग पार्टी जदयू और भाजपा का मानना है कि पिछले पंद्रह साल में बिहार में काफी विकास हुआ है जबकि विपक्षी पार्टी राजद का कहना है कि बिहार में जितना विकास उनके पंद्रह साल के कार्यकाल में हुआ था उतना विकास वर्तमान सरकार के पंद्रह साल के कार्यकाल में नहीं हुआ है. वर्तमान में बिहार के सत्ता पर काबिज राजनीतिक पार्टियों का मानना है कि बिहार में जो भी विकास हुआ है वो उनके सरकार के इसी पंद्रह साल में हुआ है. बिहार में पहले बिजली की समस्या थी, सड़कों पर गड्ढे थें, शिक्षा व्यवस्था चौपट थी. अपराध बहुत ज्यादा होती थी. इन सभी समस्याओं से छुटकारा इन्ही पंद्रह सालों के कार्यकाल में मिला है.

 

जबकि विपक्षी पार्टी यानी राजद का मानना है कि उसके शासन काल में बिहार में सबसे ज्यादा विकास हुआ है. पिछले पंद्रह साल में बिहार में कुछ भी नया नहीं हुआ है बल्कि जो भी अच्छे काम हुए थें उनको इस सरकार ने बर्बाद कर दिया.

अब गौर करते हैं इन राजनीतिक दलों के पीछले तीस सालों के इतिहास की. पता चलेगा कि इन तीस सालों सभी पार्टियों का आपस में बढ़िया तालमेल रहा है. यानी कि जो आज राजनीति में दुश्मन हैं वो कभी आपस में दोस्त हुआ करते थें. गौर करेंगे तो पाएँगे कि इस दौरान सभी पार्टियों और नेताओं की भागीदारी रही है. बीते सालों के दौरान इनकी राजनीति एक दुसरे के बीना अधूरी हुआ करती थी. दोस्ती इस हद तक हुआ करती थी कि एक दुसरे के बगैर इनकी सरकारें नहीं चल सकती थी. लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है और बीते सालों के ये दोस्त अब राजनीति में दुश्मन बन चुके हैं.

आइये नजर डालते हैं बिहार के राजनीतिक इतिहास के इन तीस सालों पर और जानने का कोशिश करते हैं किसने कितना विकास किया.

पहले हम बात करेंगे 1990 से 2005 यानी कि पहले के पंद्रह वर्ष की

इस शासनकल में लगभग वो सभी लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भागीदार रहें जो आज सत्ता में है. 1990 में लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व में जनता दल की सरकार बनी और लालू यादव बिहार के मुख्यमंत्री बने. उस समय नीतीश कुमार जनता दल से सांसद थें. भाजपा के 39 विधायकों ने सरकार का बाहर से समर्थन किया था. 1994 तक नीतीश कुमार जनता दल में थे. 1995 में नीतीश कुमार ने लालू यादव को मुख्यमंत्री के पद से हटाने के लिए अपना संघर्ष शुरू किया. 2000 से 2005 तक कांग्रेस भी सरकार के साथ जुड़ गई थी.

अब बात करते हैं 2005 से 2015 तक के शासनकाल की.

2005 में नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री बनें. जून 2013 तक भाजपा भी इस सरकार में भागीदार थी. जून में भाजपा इस सरकार से हो गई. कांग्रेस और वामदल अंदरूनी सहमती से सरकार के बचाव में आ गए. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही बने रहे. 2014 में नीतीश कुमार मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिए और उनके ही पार्टी के जीतन राम मांझी बिहार के मुख्यमंत्री बन गए.

राजद जो अभी सरकार से पिछले पंद्रह साल का हिसाब मांग रही है वो भी इस दौरान सरकार का हिस्सा रही है. 2015 में बनी महागठबंधन के सरकार में राजद भी भागीदार रही और साल 2017 तक सरकार का हिस्सा रही. 2017 में भाजपा जदयू के साथ सरकार में फिर से शामिल हो गई और इस बार का विधानसभा चुनाव दोनों दल साथ में ही लड़ रहे हैं.

कुल मिलाकर देखा जाए तो लालू यादव के पंद्रह साल के शासन काल में केंद्र में जनता दल, समाजवादी जनता पार्टी, कांग्रेस और भाजपा की सरकार रही है जबकि नीतीश कुमार के शासनकाल में केंद्र में नौ वर्ष कांग्रेस और छः वर्ष भाजपा की सरकार रही है.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here