बिहार के शंकर सिंह दिव्यांग होते हुए भी हैं गरीबों के मसीहा, सँवार रहे हैं दूसरों की जिंदगी

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कुछ लोग जिंदगी जीते हैं, कुछ लोग जिंदगी को लड़ते हैं. जो जिंदगी की लड़ाईयों को अपनी बदकिस्मती मानते हुए लड़ते हैं बदकिस्मती कभी उनका पीछा नहीं छोड़ती है लेकिन जो जिंदगी की लड़ाइयों को सौभाग्य में परिवर्तित करने के लिए खुद को एक योद्धा मानकर लड़ते हैं, उनके जयजयकार के लिए दसों दिशाएँ उद्द्वेलित हो जाती है और उनकी उद्घोषणाएँ की गूंज युगों-युगों तक बनी रहती है.

बिहार के भोजपुर जिले के आरा मुख्यालय के एक छोटे से गाँव में रहने वाले शंकर कुमार सिंह को शायद आप नहीं जानते होंगे। यदि आप महान खगोल वैज्ञानिक स्टीफन हाकिंग को जानते हों तो बहुत हद तक उनके बारे में भी अंदाजा हो गया होगा। शंकर कुमार सिंह न केवल अपने जीवन के विजेता हैं बल्कि अपने समाज के धरोहर और अभिनेता हैं. उनके शरीर का 90 प्रतिशत हिस्सा पोलियो से ग्रस्त है. बावजूद उनके उपलब्धि, कार्य और हृदय की विशालता आपको उनके जीवन को पढ़ने के लिए मजबूर कर देंगी।

नागालैंड के गवर्नर उन्हें सम्मानित कर चुके हैं। बिहार अस्मिता अवार्ड एवं 2010 में अजब दयाल सिंह शिक्षा अवार्ड भी उन्हें प्राप्त हो चुका है. बीते बड़हरा विधानसभा क्षेत्र में उन्होंने सभी दलों को एक मंच पर लाकर समाज के सामने एकता की मिशाल पेश की. वे मिग-२० चलाते हैं, आर०के इंटरनेशनल स्कूल चलाते हैं , इसके अतिरिक्त और भी संस्था चलाते हैं।


आर०के इंटरनेशनल स्कूल में वे मुफ्त शिक्षा देते हैं. वे गरीब विद्द्यार्थियों को उच्चतः शिक्षा प्रदान करते हैं. वे मिग-२० के द्वारा इंजिनीरिंग, मेडिकल की उच्च शिक्षा देते हैं. उनके छात्र NTSE एवं आईआईटी की परीक्षाओं में उत्तीर्ण होते हैं. बाढ़ में राहत कार्य भी उनके और उनके छात्रों के द्वारा चलाया जा चुका है.

बचपन में ही वे दिव्यांग हो चुके थे. इसके बाद उन्होंने अपनी पढाई जारी रखी. अपने बड़े भाई रंजीत सिंह की पीठ पर चढ़कर स्कूल जाया करते थे. पाँचवीं कक्षा में नवोदय प्रतियोगिता में पास हो गए लेकिन शारीरिक अक्षमता के वजह से प्रवेश नहीं मिल सका. उन्होंने बिना मनोबल गिराए आगे की पढ़ाई जारी रखी और नेशनल टैलेंट सर्च एग्जाम (NTSE) की परीक्षा वे 2008 में सफलता हासिल किया फिर 2013 में आई०आई०टी में देश भर में 176वा० रैंक हासिल किया।

मगर बोर्ड की परीक्षा में दो अंकों की कमी की वजह से इस में नामांकन नहीं ले सकें। इसके बाद शंकर सिंह ने भोजपुर में ही स्नातक में नामांकन ले लिया और आगे की पढाई की. उनके आदर्श स्टीफन हाकिंग थे. उनके शरीर का काफी हिस्सा बीमारी से ग्रस्त था ऐसे इंसान 4-5 वर्ष ही जी पाते हैं लेकिन वे दशकों जीवित रहें और उन्होंने इस दुनिया को विज्ञान के क्षेत्र में अतुलनीय योगदान दिया।

शारीरिक दुर्बलता होने के बावजूद कभी खुद का मनोबल गिरने नहीं दिया न ही भगवान को इसके लिए दोष दिया। हर पल आने वाले कठिनाइयों, मुसीबतों को नजरअंदाज करते हुए कड़ी मेहनत से आगे बढ़ते गए. उन्होंने पढाई पूरी करने के बाद समाज में बच्चों को शिक्षित करना शुरू किया और देश के कठिन परीक्षाओं में अपने छात्रों को सफलता दिलाई। वे इन गरीब बच्चों को न केवल शिक्षा और सफलता दिला रहे हैं बल्कि राष्ट्रप्रेम, समाजप्रेम करना भी सीखा रहे हैं. वे देश के उन्नति में अपना योगदान दे रहें हैं.

उनके इस कार्य को विस्तार दिए जाने की जरुरत है. उन्होंने अपने जिंदगी के पन्नों के हर पंक्ति में वो शब्द भरे हैं जो सभी मायनों में समाज के हर वर्ग के लिए प्रेरणादायी हैं. उन्होंने यह साबित कर दिया अगर इंसान आगे बढ़कर कुछ भी हासिल करने को ठान लें तो फिर उसके अंदर की अदृश्य शक्तियाँ खुल जाती हैं, आत्मबल के होते हुए कोई दुर्बलता घेर ही नहीं सकती है. इंसान का दिमाग उसके अंदर की सकारात्मक ऊर्जा ही सर्वश्रेठ है, जिसके सामने हर कठिनाई घुटने टेक देती है.

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