बिहारी पहचान 36 : लोक गीतों की सुरसम्राज्ञी पद्मभूषण ‘शारदा सिन्हा’

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बिहार की पावन धरती पर अनेको रत्नो ने जन्म लिया है जिन्होंने अपने काबिलियत और मेहनत के बदौलत देश ही नहीं वरन विदेशो में भी बिहार की शान बढ़ाया है। बिहारी पहचान की इस कड़ी में हम बात करेंगे एक ऐसी लोक गायिका जिन्हे बिहार की सुरसम्राज्ञी और बिहार कोकिला जैसे उपनाम दिए गए । जिनके द्वारा गाये गए गीत लोगों के रग रग बसती है। बिहार में हर शुभ मौके पर उनके द्वारा गाये गए गीत बजते है जिन्हे लोग काफी पसंद करते है। जी हाँ हम बात कर रहे है बिहार की लोकप्रिय गायिका शारदा सिन्हा की ,जिन्होंने अबतक सैंकड़ो गानों में अपने स्वर दिए है और अपनी आवाज के दम पर बिहार के रग-रग में बसी हुई है।

शारदा सिन्हा का प्रारम्भिक जीवन
शारदा सिन्हा का जन्म बिहार के सुपौल जिला के राघोपुर के हुलास में 9 अक्टुबर 1952 में एक समृद्ध परिवार में हुआ था। पिता शुकदेव ठाकुर शिक्षा विभाग में वरिष्ठ अधिकारी थे। शारदा सिन्हा बांकीपुर गर्ल्स हाईस्कूल की छात्रा रही बाद में मगध महिला कॉलेज से स्नातक किया। इसके बाद प्रयाग संगीत समिति,इलाहाबाद से संगीत में एमए किया। समस्तीपुर के शिक्षण महाविद्यालय से बीएड किया। पढ़ाई के दौरान संगीत साधना से भी जुड़ी रही। बचपन से ही नृत्य और गायन  करती रहती थी। शारदा की शादी डॉ. ब्रज किशोर सिन्हा से हुई।

शारदा की गायिकी सफर
शारदा सिन्हा ने 80 के दशक में मैथिलि ,भोजपुरी और मगही भाषा में गीत लोकगीत गाना शुरू किया और उनके गीतों को काफी पसंद किया गया। लोकगीत के अलावा उनकी ‘श्रद्धांजलि’ नामक अल्बम काफी लोकप्रिय हुई जिसमे उन्होंने कवि विद्यापति के गीतों को आवाज दिया। कैसेट के युग में उनके गाये कई गीत काफी लोकप्रिय हुए जिनमे ‘पिरितिया काहे ना लगवले, नजरा गइलीं गुइंया, पनिया के जहाज से पलटनिया बनि अइहऽ पिया’ जैसी गीत शामिल है। शारदा सिन्हा की लोकप्रियता का अंदाज इस बात से ही लगाया जा सकता है कि कैसेट वाले उस जमाने में एक रिकॉर्डिंग की 50000 रुपया फ़ीस लेती थी ,जो कि उस जमाने के हिसाब से बहुत ज्यादा था।
शारदा सिन्हा ने हिंदी फिल्मो के गीतों में भी अपनी आवाज दी है। उनके द्वारा गाये ‘मैंने प्यार किया’ फिल्म का गाना ‘कहे तोसे सजना’ काफी लोकप्रिय हुई। इसके अलावा उन्होंने ‘हम आपके है कौन’ सहित कई फिल्मो के गीतों में अपनी आवाज दी।

शारदा सिन्हा को छठ गीत और पारम्परिक विवाह गीत से अलग पहचान मिली है। आज भी गाँवों या शहरों में किसी भी शुभ अवसर पर उनके द्वारा गाये गीत ही बजती है और बिहार में कार्तिक महीना शुरू होते ही कई दिन पहले से ही उनके द्वारा गाये छठ के गीत बजने लगते है। शारदा सिन्हा की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उनके द्वारा गाये गीत को पुराने से लेकर नए वर्ग के लोगों को भी पसंद आती है।
शारदा सिन्हा ने अपने गायन से देश की सीमाओं से पार जाकर मॉरीशस में भी खूब लोकप्रियता पाई है। 1988 में उपराष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा के साथ मॉरीशस के 20वें स्वतंत्रता दिवस पर जाने वाले प्रतिनिधिमंडल में यह भी शामिल थीं। वहां इनका भव्य स्वागत किया गया, इनके गायन को पूरे मॉरीशस में सराहा गया।

अवार्ड एवं सम्मान
शारदा सिन्हा को इनके गायन के लिए राज्य और देश के कई प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका है। 1991 इन्हें भारत सरकार ने पद्मश्री अवाॅर्ड से सम्मानित किया जा चुका है। इसके साथ ही इन्हें संगीत नाटक अकादमी अवाॅर्ड समेत दर्जनों अवाॅर्ड से सम्मानित किया जा चुका है। 2018 में उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया गया है।

शारदा सिन्हा ने बेशक बिहार का नाम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर रौशन किया है ,हमें ऐसे बिहारी पहचान पर गर्व है।

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