बिहार में DGP का आदेश बेअसर, नहीं सुलझाए जा रहे लंबित मामले

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बिहार में नए DGP गुप्तेश्वर पांडेय के आने के बाद पुलिसिंग को दुरुस्त करने के लिए कई मोर्चों पर कार्य किया जा रहा था। DGP खुद हर जिलों में जाकर पुलिस अधिकारियों को जागरूक कर रहे थे। इसके साथ ही बेहतर पुलिसिंग का तरीका भी बता रहे थे। इतना ही नहीं, इस मामले पर सबसे अधिक जोर था कि लंबित आपराधिक मसलों का जल्द से जल्द समाधान किया जाए, लेकिन परिणाम ढाक के तीन पात ही आ रहे हैं।

बहुत सारे जिले आपराधिक मसलों के निपटारे में चुस्त दिखाई दे रहे हैं, तो कई जिले काफी सुस्त नज़र आ रहे हैं। इसका सबसे अधिक असर देखने को जहाँ मिल रहा है वो मुजफ्फरपुर, वैशाली एवं पटना जैसे जिलों पर है। मुजफ्फरपुर जिला लंबित आपराधिक मसले के निपटारे में बिल्कुल पीछे है। इस जिले में पुलिस अधिकारी की सुस्ती का आलम यह है की दाखिल होने वाले मामलों की तुलना में लंबित मामलों का आंकड़ा 14 से ज्यादा है। वहीँ, वैशाली में 9 गुना, पटना में 8 गुना ज्यादा है।

मालूम हो कि बिहार में औसतन हर महीने 24,000 मुकदमे दाखिल किए जाते हैं। उधर, जुलाई तक लंबित मामलों का आंकड़ा 1,52,000 के आस-पास था। DGP ने बोला था की जिन थानों में लंबित आपराधिक मामलों की फेहरिस्त लंबी है वहां जाकर पुलिस अधिकारी देखें और जल्द से जल्द समाधान करने का उपाय समझाएं। फिलहाल, लंबित आपराधिक मामलों में सबसे सबसे खराब स्थिति मुजफ्फरपुर की है। आपको बता दें कि मुजफ्फरपुर जिले में महीने में औसतन 1230 दाखिल होते हैं, वहीँ याचिका दायर होने के मुकाबले लंबित मामलों की संख्या 17,000 है, यानी दर्ज मामलों के मुकाबले 14 गुना ज्यादा केस का अनुसंधान लंबित पड़ा हुआ है।

इसी प्रकार वैशाली में भी लंबित मुकदमे का आंकड़ा 6567 है। यहां लगभग दायर हुए मामलों से 9 गुना ज्यादा है। इसी तरह पटना में जहां एक महीने में औसतन 3000 के करीब मुकदमे दर्ज होते हैं, तो लंबित मामलों का आंकड़ा 24,000 के आसपास है। वहीँ जमुई, सारण, रोहतास, गोपालगंज का भी रिकॉर्ड बेहद खराब है। दूसरी तरफ, मुंगेर, औरंगाबाद, मधेपुरा, मधुबनी, सहरसा, किशनगंज, इत्यादि स्थानों पर लंबित मामलों के निपटारे को लेकर ठीक-ठाक कार्य किया जा रहा है।

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