न्यायालय के आदेश के बाद भी पैतृक आवास में नहीं मिला एंट्री, SHO ने कहा मजिस्टेट को बुलाइए

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जब किसी भी व्यक्ति को अपने घऱ में जाने नहीं दिया जाए तो कैसा लगेगा. वो भी तब जब अपना ही सहोदर भाई उसे जाने से मना कर दें. यह पूरा मामला जहानाबाद जिले के अहियारा गांव का है. 63 साल के उमा शंकर प्रसाद ने जिलाधिकारी को एक पत्र लिखा है जिसमें उन्होंने गुहार लगाते हुए कहा है कि कोर्ट से डिग्री होने के बाद भी उनको अपने घऱमें जाने नहीं दिया जा रहा है. उन्होंने उस पत्र में यह भी लिखा है कि जब थानाअध्यक्ष को इस मामले में बताया तो उन्होंने मजिस्टेट का हवाला देते हुए कुछ भी करने से मना कर दिया.

आपको बता दें कि उमा शंकर प्रसाद और गिरजा नंदन प्रसाद दोनों ही सहोदर भाई है. उमा शंकर प्रसाद सरकार नौकरी के चलते पटना में रहते थे. वे आवश्यक कार्य से अपने गांव आते जाते थे. इधर गिरजा नंदन प्रसाद गांव में रहते हैं. ये भूतपूर्व मुखिया है. उमा शंकर प्रसाद ने अपने पत्र में लिखा है कि 1980 में पिता की मृत्यु के बाद मैंने अपने बड़े भाई से जमीन के बंटबारे के लिए अनुरोध किया लेकिन उन्होंने जमीन का बंटाबारा नहीं किया. इस दौरान बड़े भाई ने कई जगह की जमीने बेच दी. लोगों से मना करने पर भी उन्होंने नहीं माना.

अंत में हार कर वे न्यायलय में गए जहानाबाद व्यवहार न्यायालय में केस संख्या 126/99 में अवर न्यायाधीश द्वितीय श्री सच्चिदानंद सिंह थे. इसमें पूरी संपत्ती जिसमें बेची गई जमीन भी आता है. का आधा-आधा बांटने का डिग्री सन 2011 में किया गया था. इसके बाद उन्होंने उस पत्र में लिखा है कि जब मैं 2012 में अपने घऱ में रहने के लिए गए थे. बड़े भाई और उनके दोनों बेटे ने गाली-गलौज कर के और मारने की धमकी देते हुए घर में जाने नहीं दिया. इसके बाद उन्होंने घोसी थाना प्रभारी से मिकर लिखित रूप में शिकायत दी जिसमें उन्होंने कहा है कि उन्हें अपने घऱ में रहने नहीं दिया गया है. इस बावत जब फिर थानाप्रभारी से फोन पर इस केस के बारे में बात किया गया तो उन्होंने कहा कि आप कोर्ट द्वारा निर्धारित मजिस्टेट को लेकर आइए तब ही हम कुछ कर सकते हैं.

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