आज भी मुजफ्फरपुर में धड़कता है खुदीराम बोस का दिल

देश को आजाद कराने में सभी धर्मों, सभी जातियों, सभी वर्गों और देश के सभी राज्यों का बराबर का योगदान था लेकिन बिहार में जिस प्रकार से ब्रिटिश शासन के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंका गया उसने इस अत्याचारी सरकार की नींव हिला कर रख दी थी. बिहार का इतिहास असंख्य क्रांतिकारियों और स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों से भरा पड़ा है, आज उसी कड़ी में हम चर्चा कर रहे हैं अमर शहीद खुदीराम बोस की, जिन्हें महज 18 वर्ष और 08 महीने की उम्र में ही फांसी दे दी गई थी.

110th Death Anniversary of revolutionary Khudiram Bose | News ...

बिहार के मुजफ्फरपुर के सेशन जज किंग्सफोर्ड से खुदीराम बोस बेहद नाराज रहते थें. किंग्सफोर्ड ने कई स्वतंत्रता सेनानियों को कड़ी सजाएं सुनाई थी. खुदीराम बोस किंग्सफोर्ड से बदला लेना चाहते थें. उन्होंने अपने एक और क्रांतिकारी साथी प्रफुल्लचंद चाकी के साथ मिलकर योजना बनाई और मुजफ्फरपुर पहुंच गए.

खुदीराम बोस और प्रफुल्ल ने मिलकर अपनी योजना पर काम किया और 30 अप्रैल 1908 को मुजफ्फरपुर क्लब के बाहर किंग्सफोर्ड की गाड़ी पर बम फेंक दिया. उस वक्त गाड़ी में सेशन जज किंग्सफोर्ड नहीं बल्कि उसकी बेटी और अन्य दो यूरोपियन महिला बैठी थी. अंग्रेज पुलिस ने खुदीराम बोस और प्रफुल्ल को पूसा रोड रेलवे स्टेशन से उठा लिया. खुदीराम बोस 06 दिसंबर 1907 को बंगाल में ही एक रेलवे स्टेशन के बम विस्फोट की घटना के आरोपी थें.

खुदीराम बोस का जन्म 03 दिसंबर 1889 को बंगाल के मिदनापुर जिले के हबीबपुर गांव में हुआ था. बंगाल विभाजन के बाद 1905 में खुदीराम बोस आजादी की लड़ाई का हिस्सा बन गए और सत्येन बोस की अगुवाई वाले क्रांतिकारी मूवमेंट में साथ हो गए. 9वीं कक्षा के बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी थी और रिवोल्यूशनरी पार्टी में शामिल हो गए थें.

खुदीराम बोस को मुजफ्फरपुर जेल में फांसी पर लटकाने का आदेश दिया था. खुदीराम बोस ने शेर की बच्चे की तरह निर्भय होकर फांसी के तख्ते की तरह आगे बढ़ा और देश की आन बान शान के लिए अपनी कुर्बानी दे दी. कहते हैं कि आज भी मुजफ्फरपुर में खुदीराम बोस का दिल धड़कता है, जिसकी आहट से ही गर्व से सबका सीना चौड़ा हो जाता है. बिहारी न्यूज की ओर से खुदीराम बोस की शहादत की पुण्यतिथि के पावन अवसर पर कोटि कोटि नमन.

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