Friendship Day Special : वादा है इन बातो से आपको आपके बचपन के दोस्ती याद आ ही जायेगी

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फ्रेन्डशिप डे नजदीक आ रहा है। हर साल अगस्त के पहले रविवार को Friendship Day मनाई जाती है। इस साल यह 5 अगस्त को मनाई जायेगी। कहा जाता है कि दोस्ती का रिश्ता बहुत ही खास होता है। यह रिश्ता हर खून के रिश्ते से भी बढ़कर होता है। इस रिश्ते में अथाह प्यार होता है तो कही मीठी नोकझोंक भी होती है। परन्तु लाख नोकझोंक के बावजूद भी एक सच्ची दोस्ती में किसी भी प्रकार का मतभेद नहीं होता है। यह एक ऐसा रिश्ता होता है जिसमे लोग एक दूसरे के लिए किसी भी खतरे को मोल लेते है। दोस्ती के रिश्ते में कोई स्वार्थ नहीं छिपा होता है।

यूँ तो आज के दौर में दोस्ती के मायने बदल गए है ,पहले दोस्ती की परिभाषा दोस्त का प्यार और निस्वार्थ भावना होता था परन्तु अब यह सब सिर्फ सोशल मीडिया तक ही सीमित रह गया है। पहले दोस्त किसी मतलब से नहीं बनते थे बल्कि निस्वार्थ भाव से दोस्ती होती थी ,परन्तु अब दोस्ती फ़ायदा के हिसाब से होता है ,आज कल की दोस्ती अमीरी देख कर और स्टेटस देख कर की जाती है। अब दोस्ती में सिर्फ मतलब निकाले जाते है। परन्तु हर इंसान के बचपन की दोस्ती उसके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण होता है।

केजी की दोस्ती
यूं तो लोग दोस्ती हर उम्र में करते है परन्तु जब आप नए नए स्कुल गए होंगे तब भी आपकी दोस्ती हुई हो किसी ख़ास से। हालांकि उस उम्र में हम हर किसी को अपना दोस्त ही मान लेते थे। दोस्ती का असली मतलब नहीं जानते हुए भी हम उस धर्म हो बखूबी निभाते थे। अपने दोस्तों के साथ टिफिन शेयर करना ,बिस्कुट ,चॉकलेट तक शेयर की जाती थी ,यहां तक की क्लास के दौरान जब सूसू लगी हो तो दोस्त भी साथ में जाता था और वो भी कंपनी देता था। दोस्ती के इस पड़ाव में भले ही दोस्ती का मतलब नहीं पता हो पर अपने दोस्त के साथ एक दूसरे के कंधा पर हाथ रखकर चलना ही दोस्ती समझते थे। भले ही शरीर में ताकत नहीं थी लेकिन 90 के दशक के फिल्मो के हीरो की तरह दोस्त के साथ एक्शन का नक़ल जरूर करते थे।

घर की दोस्ती
उस उम्र में हर जगह अपनी दोस्ती होती थी ,खेल के लिए अलग दोस्त भी हुआ करते थे जो स्कुल से आने के बाद साथ खेलते थे। जब हम इस दौर से गुजरते है तो खेल खेल में कई चीजों को यूँ ही भुला देते है। इस दौरान दोस्ती की अनोखी मिसाल तब देखने को मिलती थी जब हमारी माँ या पिताजी हमे गुस्सा में बुलाने आते थे तब आने वाले संकट को पूर्व से भांपकर दोस्त हमे कहीं छिपा देते थे और माँ या पिताजी से कहते थे कि वो तो यहाँ आया ही नहीं या कहते थे कि वो चला गया। उस दौरान दोस्तों की यह झूठ हमे एक साधारण प्रक्रिया लगती थी ,परन्तु आज जब उस दौर को याद करते है तब इस बात का अहसास होता है कि दोस्ती की सबसे बड़ी मिसाल हम बचपन में ही दिया करते थे।

जब दोस्त के बिना नींद नहीं आती थी
दोस्त का मतलब सिर्फ साथ होना ही नहीं होता था बल्कि तब दोस्ती का मतलब एक दूसरे के दिल में बसना भी होता था। आज भले ही लोग स्वार्थ में हर रिश्ते को तोड़ देते है परन्तु उस दौर में दोस्त के बिना नीद तक नहीं आती थी और कई बार तो हम दोस्त के घर पर ही सो जाया करते थे,रात भर बेसिर पैर की बात करते करते कब नींद आ जाती थी ये पता नहीं चल पाता था। वो वक्त भी अजीब होता था। तब एक बात समझ में कभी नहीं आती थी कि मेरे दोस्त की माँ उससे कहती थी कि मेरे साथ रह रह कर वो बिगड़ गया है ,जबकि मेरी माँ कहा करती थी कि मै उसके साथ रहकर बिगड़ गया हूँ… आखिर इसमें बिगड़ने का लोचा कहाँ था यह आज तक समझ में नहीं आया कि कि कौन किसके साथ रहकर बिगड़ गया।

साइकिल चलाने की जिद होती थी तब की दोस्ती में
आज वर्तमान समय में लोगों के पास बड़ी बड़ी गाड़ियां है ,लोग गाड़ियों पर बैठकर लॉन्ग ड्राइव पर अपने दोस्तों के साथ मस्ती करते है परन्तु उस दौर की दोस्ती की वह साइकिल की सवारी हम कभी नहीं भूल सकते है जब हम नया नया साईकिल चलाना सीखे थे। उस दौरान साइकिल चलाने के लिए जिद होता था कि मै चलाऊंगा तुम बैठो। उस वक्त मजा तो तब आता था साहब जब साईकिल यात्रा के दौरान गिरना संभलना भी मजेदार होता था। जब साइकिल सवारी में लोग बहुत दूर निकल जाते थे और शाम हो जाती थी तो लौटते वक्त पीपल के पेड़ के नजदीक से भूत के डर से जोर-जोर से गीत गाते हुए वापस लौटते थे। आज भले ही वो वाकया याद करके हमे हंसी आती है , परन्तु जब सोचते है तब लगता है उस दोस्ती में एक दूसरे की फ़िक्र थी और एक दूसरे के साथ से उम्मीद भी थी ,जो शायद आज की दोस्ती में नहीं है।

हाईस्कुल -कॉलेज के दिनों की दोस्ती
दोस्ती का लेवल कॉलेज और हाईस्कुल के दिनों में बढ़ जाता है। कॉलेज लाइफ में भी कुछ सच्चे और अच्छे दोस्त बनते है जो आपके विचारो से सहमत होते है। भले ही आज सभी दोस्त बड़े स्तर पर पहुंच जाने के बाद बड़े बड़े रेस्टुरेंट में जाते है और वहाँ बिल चुकाने की जिद करते है , परन्तु बचपन और कॉलेज की दोस्ती में यह नहीं होता था। उस वक्त की दोस्ती में आर्थिक कमजोरी तो होती थी परन्तु पैंतराबाजी ज्यादा होता था। बी हम किसी लड़की के देखने और मुस्कुराने भर से चाय पार्टी करवा लेते थे। चाय के ठेले पर गर्म चाय को जल्दी से पीकर भागते थे कि कही पैसा न हमको देना पड़ जाए। उसवक्त जब इस तरह की हरकते होती थी तो उसका एक अलग मजा होता था , जो मजा आज रेस्टुरेंट में बिल अदा करने में भी नहीं आती है।

दोस्ती एक ऐसा विषय है जिसपर लिखा जाए तो शायद शब्द कम पड़ने लगते है। आजकल की दोस्ती बस सोशल मीडिया तक ही सिमित है और पैसा तक ही सिमित रह गया है। आज जब हम अपने बीते हुए उन दिनों को याद करते है जहां हमारे दोस्त साथ होते है तब यह अहसास होता है कि आज कल के भागदौड़ भरी जिंदगी में हम भले ही पैसा से आमिर बनने की कोशिश में है परन्तु रिश्तों और दोस्ती के मामलो में हम बेहद गरीब होते जा रहे है। आज भी हमे उस वक्त के दोस्तों जैसो के साथ की जरुरत है जो बिना किसी स्वार्थ के आये और हम सब मिलके कहे चलो यार आज फिर से उस दिन उस जिंदगी को जिवंत कर देते है जो कभी बचपन में किया करते थे। यकीन मानिये दोस्तों के इस साथ से हम अपनी जिंदगी के आधे से ज्यादा तनाव को ख़त्म कर सकते है। सोशल मीडिया के फ्रेंडशीप से बाहर निकलकर हमे दोस्ती की अहमियत को समझना होगा तभी हम इस जिंदगी को सुखद तरीकों से जी सकते है।

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