एक स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है गोलघर, और राजधानी पटना की है पहचान

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गोलघर एक आकर्षक वास्तुकला है जो इतिहास तथा प्राकृतिक सौंदर्य का एक संगम है। साल 1786 में इसे Captain John Garstein ने एक गोदाम के तौर पर सेवा देने के मकसद से बनवाया था। इसमें 145 सर्पिल सीढ़ी है।

स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना पेश करता है

जब भी कभी भी आप बिहार की राजधानी पटना गए होंगे तो एक विशाल अंडाकार आकार का एक भवन पर आप नज़र अवश्य गई होगी। ये भवन आकर्षक तो है ही, आम जनता के लिए जिज्ञासा का विषय भी बन जाता है, हर कोई इसके बारे में जानना चाहता है, समझना चाहता है कि आखिर ये है क्या ? ये कुछ नहीं बल्कि गोलघर है। राजधानी पटना के गाँधी मैदान से थोड़ा आगे जाकर पश्चिमी दिशा में स्थित है तथा ये स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है ये गोलघर। इस भवन की बनावट से ही इसका नाम आया है।

145 सीढ़ियों के सफर वाला ये स्थापत्य कला का ये बेजोड़ नमूना है

गोलघर के इतिहास की चर्चा की जाए तो मालूम होता है कि इसका निर्माण अंग्रेजों के शासन के दौरान वर्ष 1784 में हुआ था। साल 1770 में समूचे देश में भयंकर सूखा पड़ा था। लगभग 1 करोड़ की आबादी इस सूखे की कैद में आ गई थी एवं भुखमरी का शिकार हो गई थी। इस भुखमरी की परेशानी ने सबके दिल को दहला दिया था। इस भुखमरी का शिकार अंग्रेजी सैनिक भी हुए थे। तत्कालीन राज्यपाल General Warren Hasting के दिमाग में एक सुझाव आया। ये सुझाव बड़े से गोदाम के निर्णाण का था जिसमें अंग्रेजी सैनिक का भण्डारण किया जा सके। अंग्रेजी हुकूमत के इंजीनियर Captain John Garstein ने 20 जनवरी 1784 को अनाज भण्डार के तौर पर इस गोलघर का निर्माण आरंभ कराया तथा 20 जुलाई 1784 तक यह बनकर तैयार हो गया। इस तरह का अंदाजा लगाया जाता है कि इसमें एक साथ 1 लाख 40 हज़ार टन अनाज रखा जा सकता है।

आपको बता दें कि गोलघर का आकार 125 मीटर तथा ऊँचाई तकरीबन 29 मीटर है। इसके ऊपर जाने के लिए 145 सीढ़ियों का यात्रा पूरा करना पड़ता है। इसके ऊंचाई पर जाकर आप गंगा नदी के मनोरम नज़ारों का आनंद ले सकते हैं। गोलघर में कोई भी स्तंभ नहीं है। इसकी दीवारें 3.6 मीटर तक आधार में मोटी हैं। साल 1979 में गोलघर को राज्य सरकार ने संरक्षित स्मारक के तौर पर ऐलान कर दिया।

पौराणिक अस्तित्व को बचाने को कोशिश अब भी जारी

तकरीबन 229 साल पुरानी गोलघर, जो कि सिर्फ एक भवन नहीं पटना शहर की पहचान भी बन चुकी है वह अपनी खोटी हुई अस्तित्व से लड़ाई करता फिर रहा है। गोलघर में इस कदर दरारों का सितम मंडरा रहा था कि मानो इसका अस्तित्व ही समाप्त होता जा रहा है, लेकिन पटना शहर का पहचान बन चूका गोलघर के अस्तित्व को बचने की पहल अभी भी जारी है।

करीब 228 वर्ष पुरानी धरोहर गोलघर में दरार पड़ चुकी है, और यह बात चौंकाने वाली है। लेकिन वक़्त रहते धरोहर को बचने की कोशिश आरम्भ कर दी गई है। IIT के विशेषज्ञ, Archeological Survey Of India, के इंजीनियर ने गोलघर का सलीके से सर्वे तथा documentation के बाद इसे बचने का कार्य शुरू किया है।

सबसे पहले गोलघर में दरार की जानकारी राज्य सरकार को मिली, और ये बात चिंता तथा ऐतिहासिक इमारत को बचने की थी। मालूम हु था कि गोलघर के चार दरवाजों में से एक के नीचे से ऊपर तक एक बड़ी दरार पड़ गई है। इसके साथ ही दो और आर्च में भी दरारे थीं। राज्य में ऐसी machinery नहीं होने के वजह से राज्य ने Indian Archeological Survey से संपर्क साधा तथा उनसे सहायता मांगी।

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