क्या तय समय पर बिहार में होगा चुनाव? विपक्ष ने रखी रखी अपनी बात, अब फैसला EC को करना है

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बिहार में इस साल विधानसभा का चुनाव होना है और प्रदेश में कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है. ऐसे में य संसय की स्थिति बनी हुई है कि क्या तय समय पर विधानसभा का चुनाव हो पाएगा कि नहीं. वैसे बिहार में विधानसभा चुनाव कराने को लेकर चुनाव आयोग की तरफ से तैयारी पूरी की जा रही है. इधर बिहार में विपक्षी पार्टीयां कोरोना का हवाला देते हुए चुनाव को अगले साल कराने की बात कह रहे हैं.

इसी कड़ी में विपक्षी दलों के नेताओ की मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनो चुनाव आयुक्तों के साथ वर्चुअल मीटिंग हुई, जिसमें आगामी बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर चर्चा हुई. इस वर्चुअल मीटिंग में आरजेडी से मनोज झा, कांग्रेस के बिहार प्रभारी शक्तिसिंह गोहिल, वीआईपी पार्टी से राजीव मिश्रा, आरएलएसपी अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा, हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के अध्यक्ष जीतनराम मांझी, सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी, सीपीआई से डी.राजा, सीपीआई (एमएल) से दीपांकर भट्टाचार्य और एलजेडी से शरद यादव शामिल हुए.

इस मीटिंग में विपक्षी दलों ने कहा कि 1,000 मतदाता वाले पोलिंग स्टेशन में सोशल डिस्टेंसिंग नहीं हो पाएगी. इसलिए इसे चार हिस्सों में बांटा जाए और हर बूथ पर 250 लोगों के मतदान की व्यवस्था की जाए. इसके अलावा 65 वर्ष के ऊपर वाले मतदाताओं का पोस्टल बैलेट चुनाव आयोग ने रोका है, इसे रोका ही न जाए बल्कि इसे खारिज किया जाए. इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा है कि सबको प्रचार करने के लिए समान अधिकार मिलने की भी मांग की गई. दरअसल विपक्ष को लगता है कि बीजेपी जैसे दल डिजिटल प्रचार के तौर-तरीक से उन पर भारी पड़ेंगे. यहां तक कि संसाधन के मामले में भी उन्हें परेशानियों का सामना करना पड़ेगा.

विपक्ष ने साफ साफ कहा है कि चुनाव परंपरागत तरीके से होने चाहिए. उनकी तरफ से चुनाव आयोग से कहा गया है कि चुनाव परंपरागत तरीके से हो, न कि डिजिटल तरीके से. परंपररागत तरीके से चुनाव कराने की बात कहते हुए विपक्षी दलों ने दलील देते हुए कहा कि बिहार में स्मार्टफोन रखने वालों की तादाद कम है लिहाजा, सभी लोगों तक डिजिटल प्रचार के जरिए नहीं पहुंचा जा सकता है. ऐसे में प्रचार भी परंपरागत तरीके से करने की जरूरत है. लेकिन सबकी तरफ से एक बात फिर दोहराई गई कि जान की सुरक्षा पहले है, राजनीति बाद में. फैसला अब चुनाव आयोग को करना है. देखना है आयोग विपक्षी दलों की बातों को ध्यान में रखकर क्या निर्णय लेता है.

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