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दोस्तों, जिस तरह क्रिकेट का जन्मदाता इंग्लैंड है उसी तरह फ्रेंचाइजी लीग क्रिकेट का जन्मदाता भारत है। और इसकी खोज ललित मोदी ने की थी। साल 2007 में जब आईपीएल का स्ट्रेकचर बनकर तैयार हुआ तो दुनिया के कई क्रिकेट देशों ने इसे जोकर क्रिकेट का दर्जा दिया था। पाकिस्तान उन देशों में सबसे ऊपर है। लेकिन आईपीएल को सफल बनाने में जितना योगदान खिलाड़ियों और दर्शकों का रहा है उससे कहीं ज्यादा अहम योगदान टीम मालिकों का रहा है। यह सच है कि फ्रेंचाइजी ने आईपीएल को एक बिजनेस के रूप में देखा। लेकिन शुरू में ही एक स्ट्रकचर को देखकर करोड़ों रुपए दांव में लगा देना बड़ी बात थी। लेकिन क्या आपने ये कभी सोचा है कि दर्जनों खिलाडियों को करोड़ों रुपए में खरीदकर आखिर ये टीम मालिक आईपीएल से पैसा कैसे कमाते हैं? यह जानते हुए कि आईपीएल की प्राइज मनी उनके लिए कोई मायने नहीं रखती। आज हम अपनी इस लेख में ये बताएंगे की आखिर आईपीएल फ्रेंचाइज पैसा कैसे कमाते है प्राइज मनी के अलावा ऐसे कौन से साधन है जिससे फ्रेंचाइज पैसा कमाते है ? साथ ही आपको इसी लेख में यह भी बताएंगे की आईपीएल को कंट्रोल करने वाला बीसीसीआई आईपीएल से पैसे कैसे कमाता है ? और आईपीएल का बिजनेस मॉडल किस तरह काम करता है ?

तो चलिए शुरू करते हैं….

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दोस्तों जैसा कि हम सभी जानते है कि आईपीएल पर पूरा कंट्रोल बीसीसीआई यानी भारतीय क्रिकेट कंट्रोल ऑफ इंडिया का है। और बिना बीसीसीआई के अनुमति के आईपीएल मुमकिन भी नही है। करीब दो महीने तक चलने वाली इस लीग से जितना पैसा टीम मालिक कमाते है उससे कहीं ज्यादा बीसीसीआई कमाता है। बीसीसीआई को एक आईपीएल सीजन से लगभग 4000 करोड़ का मुनाफा होता है। सबसे पहले बात करते है आईपीएल के बिजनेस की। जिसमें बिडिंग प्रोसेस, प्लेयर सैलरी,ब्रॉडकास्टिंग, एडवरर्टीजमेंट, गेम फॉर्मेट, टीम स्पॉन्सरशिप और ब्रांड वैल्यू जैसी कई तरह की चीजों पर डिपेंड करता है। जिसे हम एक एक कर बारीकी से समझने की कोशिश करेंगे। आईपीएल का बिजनेस मॉडल औकशन और बिडिंग प्रोसेस के साथ शुरू होता है। जहां पर बीसीसीआई आईपीएल फ्रेंचाइज को एक टाइम पीरियड के लिए ऑक्शन पर डालता है। जो भी भाव फ्रेंचाइजी खरीदने के लिए तैयार होते है उन्हे बीसीसीआई इनवाइट करता है। और बिडिंग प्रोसेस में शामिल कर लेता है। जिसमें फ्रेंचाइज का बेस प्राइस होता है। यानी कि बीसीसीआई सभी टीमों का एक बेस प्राइस तय करता है।

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दोस्तों बेस प्राइस का मतलब यह है कि अगर बीसीसीआई ने किसी टीम का बेस प्राइस 1000 से 1500 करोड़ रखा है तो ये टीम इससे कम में बिकने वाली नहीं है जैसे पिछले साल यानी साल 2022 में दो नई टीम लखनऊ सुपर जॉइंट्स और गुजरात टायटंस को आईपीएल की नीलामी में रखा गया था। और इसमें फ्रेंचाइज का बेस प्राइस 2 हजार करोड़ रखा गया था। जिसमें आरपीएस ग्रुप के मालिक संजीव गोयनका ने 7090 करोड़ की बोली लगाकर लखनऊ सुपर जॉइंट्स की फ्रेंचाइजी को अपने नाम कर लिया था। और इसी वजह से लखनऊ की टीम आईपीएल इतिहास की सबसे महंगी टीम बन गई। दोस्तों जब आईपीएल 2008 में शुरू हुआ था तो यह इतना प्रोफेटेबल नही था लेकिन जब से इसके मीडिया राइट्स बिकने लगे। यह प्रोफेटेबल हो गया। और इसमें प्रत्येक फ्रेंचाइजी को 10 साल तक या एक सीमित समय के लिए ही नीलाम किया जाता है। और फ्रेंचाइजी खरीदने के बाद हर फ्रेंचाइज फीस बीसीसीआई को चुकानी पड़ती है। इसके अलावा ऑपरेशन एंड मैनेजमेंट कास्ट,मार्केटिंग कास्ट और प्लेयर कास्ट जैसी समस्या भी झेलनी पड़ती है

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जैसे कि लखनऊ की दस साल की फ्रेंचाइजी के लिए संजीव गोयनका को हर साल बीसीसीआई को 709 करोड़ रूपये फीस चुकानी पड़ती है। यानी बीसीसीआई एक फ्रेंचाइजी देकर एक मोटी रकम वसूलता है उसके मालिक से। हालाकि बीसीसीआई ब्रॉडकास्ट और मीडिया राइट्स से जो पैसा कमाती है उसका 40 से 50 प्रतिशत हिस्सा फ्रेंचाइज के मालिक को दे दिया जाता है। मतलब साफ है कि आईपीएल बीसीसीआई और टीम मालिक दोनो के लिए सोने के अंडे देने वाली मुर्गी है। दोस्तों ये था आईपीएल का मोटा मोटा बिजनेस मॉडल।

अब इसी लेख में यह भी समझ लेते है कि आईपीएल प्लेयर पैसे कैसे कमाते है ? 

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दोस्तों हर साल जब भी आईपीएल का नया सीजन शुरू होता है तो उससे पहले ऑक्शन होता है। जिसमे खिलाड़ियों पर बोली लगाई जाती है इस ऑक्शन में कैपड, अनकैप्ड, और विदेशी खिलाड़ी शामिल होते है। इसमें कैप्ड प्लेयर वो होते है जिन्होंने भारत की तरफ से अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट खेली होती है। अनकैप्ड खिलाड़ी वे होते है जो स्टेट लेवल के होते है और ये स्टेट की अनुमित से ही आते है। प्रत्येक टीम में लगभग 18 से 25 खिलाड़ी होते है इसमें चार विदेशी खिलाड़ी रखना अनिवार्य होता है और हर खिलाड़ी का अपना बेस प्राइस होता है ये बेस प्राइस खिलाड़ी खुद तय करता है। यह बेस प्राइस 20 लाख से लेकर 2 करोड़ तक हो सकता है और यह बेस प्राइस इस बात पर निर्भर करता है कि पूरे सीजन में खिलाड़ी को कितनी सैलरी मिलने वाली है। जब कोई टीम आईपीएल विजेता बनती है तो उसकी जो प्राइस मनी होती है वो टीम के मालिक और खिलाड़ियों में बंट जाता है और फ्रेंचाइजी जो भी पैसा पूरे आईपीएल से कमाती है उसका 20% उसे बीसीसीआई को देना पड़ता है। दोस्तों आपके मन में एक सवाल यह उठ रहा होगा कि कोई फ्रेंचाइजी खूब पैसा लगाकर अपनी टीम में बड़े बड़े खिलाड़ी रखकर एक शानदार टीम नही बना सकती। यह सवाल मुझे भी नहीं पता होता था। लेकिन जानकारी अर्जित करने के बाद इसका उत्तर मिला। दरअसल जब आईपीएल में खिलाड़ियों की नीलामी होती है तो प्रत्येक फ्रेंचाइजी को बीसीसीआई की तरफ से सिर्फ 90 करोड़ रुपए ही पर्स में दिए जाते है इसका मतलब आपको इसी रकम के अंदर खिलाड़ी खरीदने है। एक बात और अगर इस रकम का 60% रकम खिलाड़ियों को रिटेन करने में ही लगा देती है या फिर 40% रकम से बोली लगाती है दोस्तों यहां समझने वाली बात यह है कि यह पर्स वैल्यू हमेशा चेंज होती रहती है क्योंकि साल 2021 में सभी फ्रेंचाइजी को 85 करोड़ का पर्स वैल्यू दिया गया था। जिसे 2022 में 90 करोड़ कर दिया गया। तो इस तरह आईपीएल के खिलाड़ियों को सैलरी मिलती है।

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अब समझते है आईपीएल में रेवेन्यू कैसे जनरेट होता है। जिसमें पहला है ब्रॉडकास्टर मीडिया राइट्स, दोस्तों आईपीएल में रेवेन्यू का एक बहुत बड़ा हिस्सा ब्रॉडकास्टर मीडिया राइट्स से आता है। बीसीसीआई 60 से 70 प्रतिशत रेवेन्यू ब्रॉडकास्टर मीडिया राइट्स को बेचकर ही करता है। जब साल 2008 में आईपीएल शुरू हुआ तो इसके सारे मैच सोनी सेट मैक्स पर ही क्यों आए। ऐसा आपने सोचा होगा। दरअसल बीसीसीआई ने सोनी चैनल को साल 2008 से 2017 तक के ब्रॉडकास्टिंग राइट्स सोनी चैनल को ही बेचे थे। तब इसे सोनी ने 8200 करोड़ में खरीदा था। फिर साल 2018 से 2022 तक आईपीएल के सारे मैच स्टार स्पोर्ट्स पर दिखाए गए मतलब यह की इसके ब्रॉडकास्टिंग राइट्स को 2018 से 2022 तक स्टार चैनल ने 16347 करोड़ देकर पांच सालों के लिए खरीदा ।

दोस्तों, आईपीएल की लोकप्रियता है ही ऐसी कि जितना पसंद इसे भारत में किया जाता है उतना ही विदेशों में भी। क्योंकि इसमें विदेशी खिलाड़ी भी जो खेलते है। और इसलिए विदेशी स्पोर्ट्स चैनल को भी बीसीसीआई आईपीएल ब्रॉडकास्टिंग के राइट्स बेचती है। एक आंकड़े के अनुसार आईपीएल लगभग 140 देशों में देखा जाता है। और इन सभी देशों में राइट्स बेचे जाते है। इतना ही नहीं आईपीएल के ब्रॉडकास्टिंग राइट्स ott प्लेटफार्म को भी बेचें जाते हैं जैसे हॉटस्टार और जियो टीवी। साल 2022 में बीसीसीआई ने ब्रॉडकास्ट मीडिया राइट्स बेचकर लगभग 45000 हजार करोड़ की कमाई की।

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दुसरा है स्पॉन्सर शिप, आपने टीवी में देखा होगा कि जब आईपीएल मैच शुरू होता है तो कहा जाता है आप देख रहे है डीएलएफ आईपीएल, टाटा आईपीएल , बस यही स्पॉन्सरशिप का खेल है। इसी में सबसे पहले आता है टाइटल स्पॉन्सर शिप। जिसमें बड़ी बड़ी कंपनिया बीसीसीआई को मोटा अमाउंट देती है वो इसलिए कि उन्हीं कंपनी का नाम बार बार बोला जाए। साल 2008 में जब आईपीएल शुरू हुआ था तो टाइटल स्पॉन्सर राइट्स डीएलएफ के पास थे। 2008 से 2012 तक डीएलएफ ने बीसीसीआई को 40 करोड़ रुपए दिए थे। इसके बाद 2013 से 2017 तक इसे पेप्सी ने 396 करोड़ रुपए देकर खरीदा था। लेकिन मैच फिक्सिंग के कारण पेप्सी ने 2015 में अपना टाइटल स्पॉन्सर वापस ले लिया था। फिर 2016 से 2017 तक चाइनीज कंपनी विवो ने 100 करोड़ में खरीदा था। विवो ने 2018 से 2022 तक फिर से टाइटल स्पॉन्सर शिप 2199 करोड़ में दोबारा खरीदा था। दोस्तों साल 2019 में विवो को टाइटल स्पॉन्सर शिप से हाथ धोना पड़ा । क्योंकि उस समय गलवान घाटी में चीन और भारत की सेनाओं ने आपस में तकरार हुई थी। जिसमें चाइना ने हमारी जमीन पर कब्जा किया जिसका विरोध भारत में खूब हुआ। इसके बाद 2020 में ड्रीम इलेवन ने 2022 करोड़ में खरीदा । 2021 में विवो ने फिर वापसी की। लेकिन 2022 में टाटा ने इसे अपने नाम कर लिया। टाटा ने 2022 से 2023 तक इसे 670 करोड़ में खरीदा। ये हमने आपको इसलिए बताया कि कैसे बीसीसीआई और आईपीएल फ्रेंचाइजी आईपीएल के भिन्न भिन्न स्त्रोत से पैसा कमाती है।

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इतना ही नहीं बीसीसीआई आईपीएल में ऑफिशियल स्पॉन्सरशिप के जरिए भी पैसे कमाती है। जैसे 2022 में बीसीसीआई को 220 करोड़ में ऑफिशियल स्पॉन्सरशिप से मिले। इसमें ड्रीम 11, cred, Ru pey, Tata Safari aur outbox जैसे ब्रांड इसी में आते है। दोस्तों बीसीसीआई ने दो नई टीमें बडाई जिससे कमाई ज्यादा हो सके। आपने खिलाड़ी और अंपायर की जर्सी में कई प्रकार के लोगो देखे होंगे। जर्सी पर ब्रांड लोगो दिखाने के लिए कंपनिया भारी रकम चुकाती है जिससे कुछ आधा आधा हिस्सा बीसीसीआई और फ्रेंचाइजी को जाता है। दोस्तों जर्सी के बैक साइड यानी जहां खिलाड़ी का टी शर्ट नंबर होता है उसकी कीमत ज्यादा होती है। साथ ही कंधे , हाथ , पैंट और फ्रंट पर लगे लोगो की कीमत अलग अलग होती है अंपायर की जर्सी पर पेटियम लोगो देखा होगा। दरअसल पेटियम ने 28 करोड़ रुपए देकर अंपायर स्पॉन्सर राइट्स खरीदे है। ये हिस्सा सिर्फ बीसीसीआई को जाता है । मैच के बीच में साइट स्क्रीन पर टाइम आउट के दौरान जो सियेट टायर लोगो दिखता है सिएट ने साल 2022 में बीसीसीआई को 30 करोड़ रुपए दिए है। इसके साथ बाउंड्री पर चलने वाले विज्ञापन से भी बीसीसीआई को एक अच्छी कमाई होती है जिसका कुछ हिस्सा फ्रेंचाइजी भी लेता है।

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अंत में आता है ब्रांड वैल्यू, एक आईपीएल टीम कितना पैसा कमाती है वो टीम की ब्रांड वैल्यू पर निर्भर करता है। जैसे। मुंबई इंडियंस की ब्रांड वैल्यू 2500 करोड़ के करीब है तो चेन्नई सुपर किंग्स की ब्रांड वैल्यू 2700 करोड़ है। बाकी टीमों की ब्रांड वैल्यू 500 करोड़ से कम है। टीम फ्रेंचाइजी को कमाई का जरिया और कई जगह से मिलता है। कई बार फ्रेंचाइजी अपनी टीम से विज्ञापन शूट कराते है। जो कि उनके लिए ज्यादा प्रॉफिटेबल होता है। आईपीएल में टिकट भी पैसा बनाने जा एक जरिया होता है। इसमें बीसीसीआई को पैसा नहीं मिलता सिर्फ स्टेडियम एसोसिएशन और फ्रेंचाइजी आईपीएल टिकट के जरिए भी पैसा कमाती है। यदि किसी टीम का मैच होम ग्राउंड में होता है तो टिकट का रेवेन्यू ज्यादा होता है 80 फीसदी टिकट का पैसा फ्रेंचाइजी और 20 फीसदी एसोसिएशन रखती है। फ्रेंचाइज मार्चेनडाइजिंग के जरिए भी पैसा कमाती है इसका मतलब अपनी टीम की जर्सी, टोपी आदि बेचकर फ्रेंचाइजी मोटा पैसा कमाती है। तो दोस्तों हमने आपको लेख में यह बताने की पूरी कोशिश की है कि आखिर बीसीसीआई और फ्रेंचाइज आईपीएल से पैसा कैसे कमाती है। आपको पसंदीदा फ्रेंचाइज टीम कौन सी है हमें कमेंट करके बताइए।

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