मांझी तो खुद डूबते हैं, साथ वाले की लुटिया भी डूबाते हैं !

पूर्व सीएम जीतन राम मांझी ने जब से अपनी पार्टी का गठन किया है, तब से लेकर अब तक उन्हें सफलता कम निराशा ही ज्यादा हाथ लगी है. उन्होंने एनडीए के साथ मिलकर भी चुनाव लड़ा और महागठबंधन के साथ भी, लेकिन उनके हिस्से में शून्य ही आता रहा है. लोकसभा चुनाव 2019 हो या विधानसभा चुनाव 2015 दोनों ही चुनाव में मांझी खुद चुनावी मैदान में उतरे और पराजित भी हो गए. ये अलग बात है कि दो सीटों से मैदान में उतरे मांझी एक सीट से जीत गए थें.

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2019 का लोकसभा चुनाव

वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में जीतन राम मांझी ने राजद, कांग्रेस, रालोसपा और वीआईपी के महागठबंधन में चुनाव लड़ा. उनकी पार्टी को एक सीट भी नहीं मिली और खुद मांझी गया लोकसभा क्षेत्र से परास्त हो गए. उनके बाकी के उम्मीदवारों को भी एनडीए के हाथों पराजय का मुंह देखना पड़ा था.

2015 का विधानसभा चुनाव

वर्ष 2015 के विधानसभा चुनाव में मांझी भाजपा, लोजपा, रालोसपा के साथ एनडीए के रथ पर सवार थें. इस चुनाव में मांझी खुद दो सीटों पर चुनाव लड़ रहे थें. उनके पुत्र संतोष कुमार भी कुटुंबा विधानसभा क्षेत्र से मैदान में थें. इस चुनाव में नतीजे ऐसे आएं कि मांझी की हम पार्टी मैं हो गई यानी कि मांझी के सभी उम्मीदवार चुनाव हार गए. मांझी के पुत्र चुनाव हार गए. मांझी स्वयं दो सीटों से उम्मीदवार थें. मखदूमपुर और इमामगंज से मांझी मैदान में थें. मखदुमपुर से मांझी राजद प्रत्याशी से पराजित हो गए. इमामगंज में उन्होंने उदय नारायण चौधरी को परास्त कर विधानसभा में अपनी पार्टी का खाता खोला.

लुटिया डूब जाती है

अब तक दो चुनाव अलग अलग दो गठबंधनों के साथ लड़ चुके मांझी की पार्टी हिंदुस्तानी अवाम मोरचा सेकुलर का इतिहास यही रहा है कि ये जिस भी गठबंधन का हिस्सा रहे हैं, चुनाव में उनकी लुटिया डूब ही जाती है. अब मांझी आगे किस गठबंधन में जाएंगे, ये देखने वाली बात होगी.

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