“ककोलत”, जिसे बिहार का कश्मीर कहा जाता है, एक बार जरूर जाएं

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ककोलत जलप्रपात बिहार के नवादा जिले के गोविंदपुर प्रखंड में स्थित है |ककोलत बिहार की राजधानी पटना से 138 किमी तथा नवादा जिले से 35 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है| यह एक ऐसा जलप्रपात है जिसकी सुंदरता का वर्णन शब्दो में नहीं किया जा सकता , हम आपको बता दे की यह जलप्रपात प्रकृति सौंदर्य के मामले में देश के किसी और जलप्रपातों से कम नहीं है | ककोलत प्राचीन काल से पर्यटक और पर्यावरण प्रेमियों को अपनी ओर आकर्षित करता है | वहा के लोगो का कहना है की हमारे देश की आज़ादी से पहले घने जंगल और पहाड़ी रास्ते होने के बावजूद यह जलप्रपात अंग्रेज़ों के लिए गर्मी में एक मुख्य पर्यटक केंद्र हुआ करता था | सात पर्वतो से घिरा हुआ यह प्रपात लोगो को अपनी ओर आकर्षित करती है |

कुछ पुराणी बाते जो ककोलत से जुडी हुई है

कहा जाता है की इस प्रपात को 1811 में अंग्रेजो के शासन काल में एक फ़्रांसिसी अधिकारी के द्वारा किया गया और उन्होंने यह भी बताया की इसके नीचे एक बहुत गहरी तालाब मौजूद है जो की किसी भी नहाने वाले के लिए सुरक्षित नहीं है | तभी एक अंग्रेजी अधिकारी ने यह फरमान जारी किया की इसमे जो भी व्यक्ति नहाने जायेगा उसे पहले इसकी गहराई को देखने के लिए एक पत्थर के टुकड़े को फेकना होगा जिससे उनको उस तालाब की गहराई का अंदाजा हो जाये | कहा जाता है की इस तालाब में सैकड़ो लोगो की जान जा चुकी है | आजादी के बाद 1994 में इस तालाब को भर दिया गया जिसके बाद से यहाँ लोगो को नहाने में परेशानिया नहीं होती थी और अब यहाँ हज़ारो की संख्या में पर्यटक आते है |

ककोलत की कुछ धार्मिक मान्यताये

कहा जाता है की पाषाण काल(स्टोन ऐज) में ऋषि मार्कण्डेय का यह निवास स्थान था |
बूढ़े बुजुर्ग की माने तो यह भी नकहा जाता है की बैशाखी के अवसर पर स्नान करने से जिनका जन्म सांप योनि में होना है वो उससे मुक्त हो जाते है |
लोगो की यह भी धारणाये है की राजा नृप को किसी ऋषि मुनि ने श्राप दे दिया था जिसके कारण वो अजगर के रूप में इस जलप्रपात में निवास कर रहे थे| तभी ऋषि मार्कण्डेय ने उन्हें देख लिया और इस श्राप से उन्हें मुक्त कर दिया |
कहा जाता है की अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने अपना कुछ समय यहाँ पर बिताया था और उसी दौरान उन्हें पहली बार भगवन श्री कृष्ण के दर्शन हुए थे |
प्राचीन कहानियो की माने तो प्राचीन काल के दौरान इस जंगल में मदालसा नाम की एक पतिव्रता नारी रहती थी जिसका पति कुछ रोगो से ग्रसित था जिसके कारण वो न तो चल पता था और न ही बोल पता था , लेकिन मदालसा अपने पति को प्रतिदिनअपने कंधे पर बैठा कर इस प्रपात में नहाने के लिए लाया करती थी | कुछ समय बाद उसका पति निरोग हो गया|
कहा जाता है की इस छेत्र में कोल जाती के आदिवासी का निवास होता है जिसके कारण ही इसका नाम ककोलत रखा गया है|

ककोलत पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र

यह प्रपात हमेशा से ही प्रकृति प्रेमियों और पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र रहा है | यहाँ हर साल 14 अप्रैल को 5 दिनों के लिए ‘सतुआनी मेला’ का आयोजन किया जाता है | जिसमे ढेर सारे लोगो का जमवाड़ा लगता है , वर्ष 2000 में झारखण्ड से अलग होने के बाद ककोलत एक मात्र ऐसा जलप्रपात है जिसका पौराणिक कथाओ से जुड़ाव है |

डाक टिकट पर अंकित

बिहार सरकार इस प्रपात की महत्ब को समझे या न समझे लेकिन भारत सरकार इसकी महत्ब को बखूबी समझती है और इसके प्रारूप डाक एवं तार विभाग ने इस जलप्रपात की ऐतिहासिक महत्ब को देखते हुए ककोलत जलप्रपात पर पांच रुपये मूल्य का डाक टिकट भी जारी किया है |

सरकार इसकी खूबसूरती में चार चांद लगाने के बजाय इसके अस्तित्व को मिटाने के लिए तत्पर हैं न इसकी कोई देख भल की जाती है न ही कोई निरक्षण , बिहार के कश्मीर कहे जाने वाले इस स्थल पर अस्तित्व मिटने का खतरा मंडराने लगा है| जबकि विकास के इस दौर में इसे सबसे ऊपर होना चाहिए था, लेकिन हालत यह है कि विकास कार्यों में इसका स्थान कहीं नहीं है। पिछले एक दशक से इस प्रसिद्ध जलप्रपात की सरकारी उपेक्षा ने स्थानीय लोगों को निराश किया है। यदि ककोलत जलप्रपात को सरकारी प्रयास से विकसित तथा और सुन्दर कर दिया जाए तो यहां विदेशी सैलानियों की भीड़ लगी रहेगी, जिससे सरकार के साथ-साथ यहां के लोगों को भी फायदा होगा |

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