जानिए, कोरोना मरीजो के लिए कितनी कारगर है रेमेडेसिविर

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बिहार में दिन प्रतिदिन कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या में वृद्धि हो रही है. ऐसे में कोरोना संक्रमित मरीजो के इलाज के लिए महत्वपूर्ण दवा रेमडेसिविर की कालाबाजारी की शिकायतें खुब मिल रही है. बताया जा रहा है कि इस दवा को मुल्य से ज्यादा पैसे में बेचा जा रहा है. स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों का कहना है कि आप कालाबजारी करने वाले लोगों को नाम बताइए हम कार्रवाई करेंगे. ऐसे में आइए जान लेते हैं यह दवा कोरोना काल में कितना कारगर है.

हिंदुस्तान अखबार में छपी खबर के अनुसार रेमेडेसिवर दवा को लेकर जितना हाहाकार मचा है. वह संक्रमित मरीजों के मौत के जोखिम को कम करने में कारगर नहीं है. आपको बता दें कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोरोना के इलाज के लिए जिस रेमेडेसिवर के साथ ही चारअन्य तरह की दवाइयों का जिक्र करते हुए कहा है कि इसके तथ्य चौकाने वाले हैं. आपको बता दें कि रेमेडेसिवर, हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वाइन समेत चार दवाओं का मरीजों के उपचार में सबसे ज्यादा उपयोग किया जा रहा है. पर शोध में पाया गया कि ये दवाएं मौत का जोखिम घटाने में बिल्कुल कारगर नहीं हैं.

इन दवाओं को लेकर WHO के सॉलिडेटरी ट्रायल के तहत कोविड-19 के उपचार में उपयोग की जा रहीं चार सर्वाधिक प्रचलित दवाओं रेमेडेसिवर, हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वाइन, लोपिनवीर-रटनवीर और इंटरफेरॉन बीटा -1 ए का अध्ययन दुनिया के तीस देशों में किया गया. जिसमें 405 अस्पतालों के 11266 संक्रमित मरीजों को शामिल किया गया. इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने रेमेडेसिवर, हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वाइन, लोपिनवीर-रटनवीर और इंटरफेरॉन बीटा -1 ए दवाओं के माध्यम से उपचार किए जा रहे मरीजों का अध्ययन किया. जिसमें रेमेडेसिवर दवा पाने वाले मरीजों की अवस्था को लेकर पांच बार फॉलोअप किए गए ताकि इस सर्वाधिक प्रचलित दवा के असर की सही-सही जानकारी सामने आ सके.

शोध में जो नतीजे सामने आए हैं, वे प्रारंभिक स्तर के हैं पर ये दवाओं पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं. शोध की माने तो रेमेडेसिवर समेत चारों सर्वाधिक उपयोग की जा रहीं दवाओं के जरिए मरीजों में वेंटिलेटर की आवश्यकता को कम नहीं किया जा सकता. न ही इन दवाओं से मृत्यु के जोखिम को कम करने में कोई मदद मिलने के रुझान मिले. इतना ही नहीं, जिन मरीजों को हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन या इंटरफेरॉन बीटा -1 ए दी जा रही थी, उनकी बचने की संभावना पायी गई. इधर ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के महामारी विशेषज्ञ ने WHO के इस अध्ययन के बारे में कहा है कि यह वैज्ञानिकों और चिकित्सकों के लिए बहुत बड़ा खतरा साबित होगा. उन्होंने कहा कि शोध में सभी दवाओं का समग्र अध्ययन हुआ. हमें उम्मीद थी कि अन्य दवाओं के मुकाबले रेमेडेसिवर का प्रदर्शन बेहतर होगा पर इससे मरीज के उपचार में कोई विशेष लाभ न मिलना बेहद निराशाजनक है. गौरतलब है कि अभी यह एक प्री-प्रिंट शोध है जिसकी समीक्षा होना बाकी है.

पिछले साल जब कोरोना महामारी की शुरुआत हुई थी उस समय रेमेडेसिवर दवा का क्लिनिकल ट्रायल शुरु हुआ था. जिसमें यह पाया गया था कि इस दवा के इस्तेमाल से रोगियों के ठीक होने का समय 15 दिन से घटकर 11 दिन हो जाता है. इसके बाद इस दवा की मांग दुनियाभर में बढ़ गई. यह अध्ययन अमेरिकी एजेंसी ने करायी थी. तब इस दवा के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कई बयान दिए थे. दवा निर्माता कंपनी गिलीएड ने कहा था कि जब तक महामारी चलेगी, वह इस दवा के निर्माण के लाइसेंस पर कोई रॉयल्टी नहीं लेगी. मई के आसपास भारत सरकार ने भी इस दवा के आधिकारिक उपयोग को मंजूरी दे दी थी.

फिलहार भारत में इस दवा की भारी कमी की खबरे सामने आ रही है. आपको बता दें कि इस दवा का सरकारी अस्पताल में चोरी की भी खबरे सामने आ रही है. भोपाल के एक अस्पातल से इस दवा की चोरी होने की बात कही गई है.

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