कोरोना काल में बढ़ता अवसाद जानिए उसके कारण और उपाय

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वर्तमान में कोरोना वायरस जैसी महामारी ने वैश्विक स्तर पर अपने पांव पसारे हैं लगभग सभी देश इस महामारी के सामने घुटने टेक चूकें हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू. एच. ओ.) जो विश्व के विभिन्न देशों के साथ मिलकर स्वास्थ्य से संबंधित मुद्दों और समस्याओं पर मिलकर काम करने व मानक विकसित करने वाली संस्था हैं उसने भी फिलहाल इसके सामने घुटने टेक दिये हैं। इस महामारी के चलते मनुष्य की मानसिक समस्याएँ बहुत तेजी के साथ बढ़ रही हैं। जिससे लोग अवसाद में जा रहे हैं और आत्महत्या कर रहे हैं। कोरोना का यह भयावह स्थिति ही व्यक्ति को अकेलापन महसूस कराती है जिससे हम सब न तो सुख बाँट पाते हैं और न दुख, बल्कि इन दोनों प्रक्रियाओं से वंचित रह जाते हैं। ऐसी स्थिति में अवसाद में जाने का खतरा ज्यादा बढ़ जाता है।

पहले आम तौर पर डिप्रेशन मात्र कुछ लोगों में पाया जाता था किंतु कोरोना महामारी के पश्चात इसका प्रसार काफी तेजी से होता हुआ दिखाई देता है। अलग अलग संस्थाओं के सर्वे में दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में डॉक्टरों में किए गए सर्वे में 78 फीसदी ने स्वीकार किया कि वे कोरोना के चलते डिप्रेशन में हैं। इनमें से 89 फीसदी लोग सिवियर डिप्रेशन का शिकार पाए गए। बैंगलुरु में स्थित राष्ट्रीय मानसिक आरोग्य व स्नायु विज्ञान संस्थान (निम्हान्स) की अखिल भारतीय हेल्पलाइन पर 29 मार्च से अब तक तीन लाख लोगों ने डिप्रेशन से संबंधित परामर्श लिया है। यही हालत जयपुर, आगरा, रांची और मुंबई की है। पुरुषों में नौकरी जाने, धंधा खत्म होने और भविष्य की चिंता, कोरोना से संक्रमित होकर मरने, दुनिया के नष्ट होने जैसे नकारात्मक विचारों की वजह से अवसाद पाया जा रहा हैं। ये आंकड़े चौकाने वाले हैं। अभी लोग घरों में रह तो जरूर रहे हैं लेकिन सुबह से ऑनलाइन कार्यों को करने बैठ जाते है जिससे घर में किसी से संवाद नहीं हो पाता जिससे आपस में बढ़ती वैचारिक संकीर्णता परस्पर वैमनस्य व मतभेद के कारण अवसाद बढ जाता है। इसी क्रम में घरों में झगड़े की वजह से संवाद का स्तर गिरने से समाज में अशांति का वातावरण बनता जा रहा है।

समाजिक एवं पारिवारिक जीवन में परस्पर मतभेद और एक दूसरे के प्रति मनमुटाव एक प्रकृतिक प्रक्रिया है लेकिन यही मतभेद व मनमुटाव समूहिक संवाद के अभाव में एक बड़ा रूप ले लेता है और कभी-कभी यह एक बड़े विच्छेद के रूप में परिवर्तित होकर अपूर्णनीय क्षति का कारण बनता है और इसका हमें भान ही नहीं हो पाता है। संबंध बिखर रहे है, परिवार टूट रहे हैं। व्यक्ति का जीवन एकाकी और अवसाद ग्रस्त होता जा रहा है। अगर इसको हम भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखने व समझने का प्रयास करेंगे तो भारत में समूहिक संवाद की एक दीर्घ परंपरा चली आ रही थी। लेकिन आधुनिक जीवन-शैली ने जिस प्रकार से हमारे समाज को संवाद से संवादहीनता की ओर धकेला है और उसके बाद जो संवाद की स्थिति बची भी थी वह कोरोना महामारी ने खत्म कर दी है जिसका असर समाज में हमें लगातार देखने को मिल रहा है। लोग बड़े पैमाने पर अवसाद में हैं और आत्महत्या जैसे कदम उठाने को मजबूर हो रहे हैं। क्योंकि आधुनिकता के वैश्विक युग में जब तकनीक का विकास अपनी अंतिम सीमा पर पहुँच रहा है दुनिया को एक गाँव जैसा देखा जा रहा हैं ऐसे में अब हम सबके पास एक दूसरे के लिए समय नहीं बचा है। क्योंकि इस तकनीक ने सभी को अपने-अपने दिनचर्या के कार्यों में इतना व्यस्त कर दिया है और विश्राम के समय को जिसमें सामूहिक संवाद होता था उस समय को मोबाइल, लैपटाप, इंटरनेट आदि ने समूहिक संवाद का स्थान ले लिया है। समाज के प्रत्येक वर्ग में जो समूहिक संवाद की प्रक्रिया बनी हुई थी वो इस लगभग ख़त्म होने के कगार पर लाकर खड़ा किया है। ऐसे में डिप्रेशन से बचने के लिए हम सब को मिलकर समाज में समूहिक संवाद की एक स्वस्थ प्राकृतिक परंपरा को आगे बढ़ाने की कोशिश करनी होगी। गांधी ने काफी पहले ही इस अंधी पागल दौड़ के बारे में चेताया था। उनकी इस बात को मानकर किसी को भी भौतिक सुविधाओं को जमा करने के लालच में नहीं पड़ना चाहिए। भारत में शुरू से ही पारंपरिक संवाद की स्थिति थी जिसे आधुनिकता ने नकार दिया है। इसलिए डिप्रेशन से बचने के लिए संवाद बेहद आवश्यक है। कोरोना माहमारी के बीच बढ़ते डिप्रेशन का अंत संवाद से ही हो सकता है!

परामर्श हेतु टोल फ्री नंबर-  cip-  1800-345-1849 (24 hr helpline no.)

लेखक

सुधीर कुमार (एम. एस. डब्ल्यू) सायकेट्रिक सोशल वर्कर

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा

संपर्क- 9764383543

ईमेल- [email protected]

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