मध्य प्रदेश में क्यों भागें कांग्रेस के विधायक, पढ़िए रिपोर्ट

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वर्तमान समय कांग्रेस के लिए सियासी सूखे जैसा है. कांग्रेस देश की अब तक की इकलौती ऐसी पार्टी बन गई है जिसके विधायकों को कोई भी गाजर मूली की तरह खरीद लेता है. थोड़ी सी भी कोशिश करके कांग्रेस विधायकों को लोग अपने पाले में ले लेता है.

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पति से झगड़ा हो जाए तो पत्नी कोठे पर जाकर नहीं बैठ जाती ! धोनी का टीम इंडिया में सेलेक्शन नहीं हुआ तो क्या वो पाकिस्तान की टीम में शामिल हो गए ? नहीं लेकिन कांग्रेस का हाल इन सबसे अलग है.

विचारधारा पाॅकेट में विधायक तुरंत उल्टी विचारधारा वाली पार्टी में.
इसके पीछे की वजह क्या है, इसे समझना जरुरी है. दरअसल कांग्रेस और भाजपा में जो सबसे बड़ा फर्क है, वो ये है कि भाजपा में संगठन ही सबकुछ है कांग्रेस में संगठन कुछ भी नहीं है. आपको बहुत कम ही ऐसे लोग दिखेंगे जो पंचायत, प्रखंड या जिला स्तर पर कांग्रेस में काम करते हुए आगे बढ़ते दिख जाएंगे. कांग्रेस में विधानसभा के टिकट बड़े नेताओं की पैरवी पर बांटे जाते हैं.

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कांग्रेस में कोई पार्टी का आदमी नहीं होता बल्कि नेता का आदमी होता है. इलाके के जो भी बड़े नेता होते हैं, वो जैसे ही पार्टी छोड़ते हैं वैसे ही उनके समर्थक विधायक और कार्यकर्ता ही पार्टी को अलविदा बोल जाते हैं. मध्य प्रदेश में जिस तरह से कांग्रेस के विधायक इतनी बड़ी संख्या में पार्टी छोड़ कर चले गए, उससे कांग्रेस को सबक सीखने की जरुरत है.

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कांग्रेस के समर्थकों को भाजपा या दूसरे दलों को कोसने की बजाय अपनी पार्टी की कमियों को देखना चाहिए. संगठन की जितनी उपेक्षा कांग्रेस में होती है, उतनी दूसरी किसी पार्टी में भी नहीं.

अगर संगठन में काम करने वाले लोगों को कांग्रेस टिकट देती तो ये हाल कभी नहीं होता. ऐसा नहीं है कि कांग्रेस में वफादार और विचारधारा के प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं की कमी नहीं है लेकिन वो बेचारा कभी टिकट की रेस में शामिल ही नहीं हो पाता.

कांग्रेस को अब भी चेतना चाहिए, हालांकि इसकी उम्मीद दूर दूर तक दिखाई नहीं देती.

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