कोरोना काल में छूट गई नौकरी तो बना ली जूते-चप्पल की फैक्ट्री

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कोरोना वायरस के कारण लागू हुए लॉकडाउन में कई लोगों की नौकरियां चली गई. सबसे ज्यादा इस दौरान परेशानी उन लोगों को हुई जो रोज कमाते थे और उसी पैसे से अपना घर चलाते थे. दूसरे शहरों में जाकर नौकरी करने वालों के लिए भी अब नौकरी छूट गई है. ऐसे में अपने प्रदेश आए लोगों को फिर से नौकरी पाना और रोजगार शुरू करना एक बड़ी समस्या बनती जा रही है. हालांकि बिहार सरकार आश्वासन दे रही है कि बिहार आए प्रवासी श्रमिकों को रोजगार दिया जाएगा. बिहार के दो युवको ने मिलकर अपने घऱ में ही जूते-चप्पल की फैक्टरी लगा ली है.

ये दोनों युवक जमूई जिले के रहने वाले हैं. ये दोनों युवक जिले के लक्ष्मीपुर इलाके के मोहनपुर गांव के रहने वाले हैं. इनका नाम अशोक दास और उनके बहनोई का नाम संतोष दास है ये दोनों पिछले 15 साल से तमिलनाडु के सेलन स्थित एक फुटवियर कंपनी में काम करते रहें हैं. ये दोनों सेलम में एक तकनीशियन के रूप में काम करते थे. इन दोनों लोगों की खाशियत यह है कि इन दोनों ने विदेश से आए लोगों से प्रशिक्षण प्राप्त किया है. इन दोनों लोगों ने खासकर दिव्यांगजनों और डायबिटिज के मरीजों के लिए जूते-च्प्पल बनाने वाले फुटवियर कंपनी में कई सालों तक काम किया है. काोरोना काल में काम नहीं होने के कारण ये दोनों अपने घर लौट आए हैं.

घर लौटने के बाद दोनों ने ठान लिया कि घऱ में ही जुते चप्पल की फैक्टरी लगाएंगे. इसकेबाद इन दोनों ने कोलकाता से जूते-चप्पल बनाने की मशीन मंगवा कर खुद की फुटवियर कंपनी खोल दी. इन्होंने केंद्र की उस योजना को ध्यान में रखा है जिसमें कहा गया है कि लोकल के लिए वोकल होने की जरूरत है. इन दोनों युवाओं ने दिव्यांगजनों और डायबिटीज के मरीजों के लिए जूते चप्पल बनाने शुरू कर दिए हैं. इसके साथ ही ये सामान्य लोगों के लिए भी प्रोडक्ट बना रहे हैं.

आसपास के लोगों न जब जूते चप्पल की फैक्टरी की बात सुनी तो उन्हें खुशी हुई है. बाजार से सस्ते में यहां जूते चप्पल मिल रहे हैं. इनके प्रोडक्ट की मांग अब बढ़ने भी लगी है. मात्र ढाई महीने में ये लोग आर्थोपैडिक्स डाक्टरों के पास से आए दर्जनो आर्डर को पूरा कर चुके हैं. सस्ता और लोकल प्रोडक्ट होने के साथ-साथ मामूली शिकायत को तुरंत दूर कर देने के कारण इनकी फुटवियर की मांग भी बढते जा रही है.

अशोक दास कहते हैं कि जबसे यह काम शुरू किया है मेडिकेटेड जूते और चप्पल की खूब मांग हो रही है. उन्होंने कहा कि जिले के कई ऑर्थोपेडिक डॉक्टर उनसे संपर्क कर मरीजों के सहूलियत अनुसार जूते और चप्पल ऑर्डर देकर बनवाते हैं, जिससे उनकी आमदनी हो रही है. जिस जूते-चप्पल को 600 रुपया में बेचते हैं उसकी कीमत दूसरे जगह से मंगाने पर दो से ढाई हजार की पड़ती है, अब आगे योजन है कि दोनों मिलकर डेढ़ से दो सौ लोगों को रोजगार दें.

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