राजनीति में उलझे धर्म और संस्कृति का आयना दिखा गयी मोहल्ला अस्सी ….

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मोहल्ला अस्सी फिल्म काशीनाथ सिंह के उपन्यास ‘काशी का अस्सी ‘पर बनी है।इस फिल्म की कहानी 1988 के बनारस से शुरू होती है और अगले 5 -10 साल में हुए सामाजिक ,राजनैतिक और वैश्वीकरण के परिवर्तन की घटनाओ को इसमें दिखाया गया है। यह फिल्म काशी स्टेशन से शुरू होती है और अस्सी घाट पर ख़त्म होती है।फिल्म के दृश्य फिल्म की जान है। वो गंगा के किनारे पर अस्सी घाट का नजारा ,मंदिरों में बजती घंटियां ,घाट पर पूजा करती महिलायें ,घाट के किनारे बसे ब्राह्मणों का घर आपको वहां होने का अहसास दिलाएगी।

मोहल्ला अस्सी जो की ब्राह्मणों का मोहल्ला है ,जिसके अध्यक्ष धर्मनाथ पांडेय (सनी देओल ) है ,जो एक पुजारी ,शिवभक्त और संस्कृत के अध्यापक हैं।जो घाट पर पूजा करा के और संस्कृत पढ़ा के अपने घर का लालन पोषण करते है।धर्मनाथ अपने मूल और सिद्धांतो के पक्के इंसान है। उन्होंने अपने घर के साथ पुरे मोहल्ले को बाज़ारवाद की दुनिया से दूर रखते है ,बनारस में कई विदेशी घूमने आते है और यहाँ अस्सी में रहने का ठिकाना ढूंढते है।पर ब्राह्मणों के मोहल्ले में विदेशियों का रहना धर्मनाथ को बिलकुल मंजूर नहीं है,उनका मानना है कि विदेशियों ने अस्सी घाट को बाजार बना दिया है।धर्मनाथ की पत्नी (साक्षी तंवर )ने एक आदर्श पत्नी का किरदार बखूभी बिभाया है ,जो धर्मनाथ के हर सुख -दुःख में उनका साथ देती है।इस फिल्म में चाय की दुकान पर होने वाले राजनीतिक संवादों को और वहां के माहौल को बखूबी दर्शाया गया है।

निर्देशक चाय की दुकान पर होने वाली संवादों की महत्व को समझाते है ,कि हिंदुस्तान में दो संसद चलती है एक दिल्ली में और एक चाय के दुकान पर।समय के साथ साथ धर्मनाथ की आर्थिक हालत दिन पर दिन ख़राब होते जा रही है और जिसके कारण उसे अपने आदर्श और सिद्धांतो के साथ समझौता करना पड़ता है।और आखिरकार उन्हें मजबूरन एक विदेशी महिला को अपने घर में रखने को मजबूर हो जाते है।फिल्म में गाइड की भूमिका में गिन्नी (रवि किशन )ने भी शानदार अभिनय किया है।इस फिल्म में बाजारीकरण के हर पहलुओं को दिखाया गया है ,चाहे गंगा मैया हो या योग या फिर शिव के साथ फोटो ,यहाँ हर चीज बेचीं जा रही है ,फिल्म में एक जगह संवाद भी है कि वो दिन दूर नहीं जब ताज़ी हवा भी बेचीं जाएगी.फिल्म के डायलाग मिलाजुला के ठीक ठाक है .इस फिल्म में यह भी दिखाया गया है कि कैसे एक ज्ञानी इन दिनों मोहताज हो गया है और पाखंडी पूजे जा रहे है .

शुरुवात के पहले घंटे तक तो फिल्म कि कहानी भटकती रहती है जैसे कि २ सीन को आपस में जोर जा रहा है .दुसरे घंटे में फिल्म कहानी पर वापस लौटती है .फिल्म में धर्म कि राजनीति पर भी करा प्रहार किया गया है .मंदिर मस्जिद के विवाद में कैसे सालो से साथ रहने वाले विभिन्न धर्म लोगो के में तनाव आ जाता है .फिल्म में यह भीं दिखाने कि कोशिश की गयी है ,परिवर्तन संसार कि प्रकृति है ,इससे आपको स्वीकार करना ही होगा ,साथ ही साथ यह भी देखने को मिला कि हम अपने मूल और संस्कृति को को मिटने से नहीं बचा पाए . अगर आप भारतीय राजनीति ,धर्म,संस्कृति में रूचि रखते है तो आपको यह फिल्म एक बार जरुर देखनी चाहिए .

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