मोहर्रम के जुलूस में बनैठी खेलते थें लालू प्रसाद

राष्ट्रीय जनता दल के प्रमुख और बिहार के पूर्व सीएम लालू प्रसाद यादव बचपन में अपने गांव में बेहद लोकप्रिय हुआ करते थें. लालू अपनी आत्मकथा गोपालगंज से रायसीना में लिखते हैं कि उन्हें अपने गांव में रामनवमी और मोहर्रम के त्योहार का इंतजार करते थें. उन्हें ये दो त्योहार बेहद पंसद थें. रामनवमी में जहां लालू प्रसाद काली माई को चढ़ने वाले प्रसाद बेहद पसंद थें तो मोहर्रम का जुलूस उन्हें बड़ा रास आता था. लालू दोनों त्योहारों में बढ़ चढ़ कर अपनी भागीदारी सुनिश्चित करते थें.

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ताजिये का जुलूस

लालू बताते हैं कि उनके बचपन में मोहर्रम के महत्व का पता नहीं था. उन्हें किसी ने नहीं बताया था कि मोहर्रम शोक का त्योहार है. इस दौरान उनके गांव में मोहर्रम के समय ताजिया का जुलूस निकलता था. इसमें गांव के मुस्लिम समाज के लोग रंग बिरंगे ताजिये का निर्माण करते थें. इस अवसर पर पूरे गांव में जुलूस निकलता और गांव के हिंदू, मुसलमान सब इस जुलूस में शामिल होते थें.

लालू की बनेठी

लालू भी जुलूस में शामिल होते और बनेठी का खेल खेलते चलते थें. बनेठी का मतलब एक लाठी होती थी, जिसके दोनों सिरों पर गेंद के आकार की गोल लकड़ी लगी होती थी. लालू बोलते हैं कि कोई उन्हें बनेठी खेलने से रोकता नहीं था. गांव में इस बात की चर्चा होती थी कि बिना किसी ट्रेनिंग के लालू बेहतरीन बनेठी खेला करते थें. लालू इस मामले में गांव में बेहद लोकप्रिय भी थें.

रामनवमी का प्रसाद

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वहीं अपने गांव की रामनवमी की चर्चा करते हुए लालू बताते है कि इस मौके पर पूरे गांव की महिलाएं इकट्ठा होकर काली माई की पूजा करती थी. पूजा के बाद रसियाव यानी गुड़ और दोहती रोटी का प्रसाद चढ़ता था. पूजा के बाद ये प्रसाद खाने को मिलता था, जो बड़ा ही स्वादिष्ट होता था. जब तक पूजा होता रहता था, लालू और उनके दोस्त काली माई के पास वाले नीम के पेड़ पर चढ़कर खेलते रहते थें.

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