बिहार की राजनीति में आने वाला है भूचाल, एनडीए की मुसीबत बढ़ा सकते हैं चंद्रशेखर रावण

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वैसे तो यह खबर आई है उत्तर प्रदेश से लेकिन मुसीबत चिराग पासवान की पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी के लिए भी मुश्किल भरा है. दलित राजनीति का झंडा ढोने वाली पार्टियों के लिए कल यानी 15 मार्च की तारीख बड़ी मुश्किलों भरी रही. 15 मार्च को बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम की जयंती थी. इस अवसर पर भीम आर्मी के मुखिया और देश भर के दलित नौजवानों के रोल माॅडल बनें चंद्रशेखर रावण ने नई पार्टी की स्थापना करने का ऐलान कर दिया. पार्टी का नाम है, आजाद समाज पार्टी.

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चंद्रशेखर रावण की नई पार्टी की घोषणा ने देश की दलित राजनीति में एक तरह से भूचाल लाकर रख दिया है. इससे पहले यूपी में मायावती की पार्टी बहुजन समाज पार्टी और बिहार में रामविलास पासवान और चिराग पासवान की पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी दलित राजनीति की सबसे बड़ी शक्ति हुआ करती थी.

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वैसे इन दोनों की पार्टियों ने दलितों को एकजुट, मजबूत और सशक्त करने की बजाय उन्हें आपस में लड़ाने भिड़ाने का ही काम किया. बसपा जहां रविदास समाज की पार्टी बन कर रह गई तो वहीं लोजपा सिर्फ पासवान बिरादरी की. किसी ने भी संपूर्ण रुप से दलितों को एकत्र करने में कोई रुचि नहीं दिखाई जबकि चंद्रशेखर रावण का राजनीतिक अंदाज इन दोनों पार्टियों से जुदा है.

 

बसपा और बामसेफ के संस्थापक के साथ ही दलित राजनीति के बड़े चेहरे रहे कांशीराम की जयंती पर ही अपनी पार्टी की स्थापना चंद्रशेखर रावण ने बहुत कुछ साफ कर दिया है. ऐसा माना जा रहा है कि इस नई पार्टी आजाद समाज पार्टी में दलित समुदाय के हर जाति, वर्ग के लोगों के लिए जगह होगी.

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चंद्रशेखर रावण की इस नई पार्टी को लेकर पहले से स्थापित दलित नेताओं में खलबली का माहौल है. मीडिया रिपोटर््स को मानें तो बहुजन समाज पार्टी के करीब 15 पूर्व विधायकों और 03 पूर्व सांसदोें ने चंद्रशेखर आजाद की पार्टी का दामन थाम लिया है. आजाद समाज की पार्टी की फिलहाल नजर यूपी और बिहार विधानसभा चुनाव पर है.

चंद्रशेखर रावण बिहार और यूपी के दलित नौजवानों में समान रुप से लोकप्रिय है. दलित समाज की सभी प्रमुख जातियों में चंद्रशेखर का समान वर्चस्व है. ऐसे में वो यूपी में जहां बसपा के लिए बड़े खतरे के तौर पर सामने आ रहे हैं तो वहीं बिहार में लोजपा के लिए. लोजपा फिलहाल एनडीए के साथ है और संकट एनडीए के आधार वोटों पर ही आने वाला है. चंद्रशेखर के साथ रविदास और पासवान दोनों साथ है. बिहार में दलित आबादी लगभग 9 प्रतिशत है.

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इसमें कोई दो राय नहीं कि चंद्रशेखर रावण की लोकप्रियता फिलहाल दलित युवाओं में शीर्ष पर है. उनका संगठन भीम आर्मी बिहार में भी काफी सक्रिय है और बड़ी तादाद में लोग उनके साथ जुड़े हुए हैं. ऐसे में बिहार की राजनीति को भी चंद्रशेखर रावण किस हद तक प्रभावित कर पाते हैं, ये देखने वाली बात होगी.

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