सासाराम विधानसभा क्षेत्र : पूरी तरह से बदल जाएंगे समीकरण, अब कौन होगा राजद उम्मीदवार ?

सासाराम विधानसभा क्षेत्र से दो बार राजद के विधायक रहे डॉ अशोक कुमार कुशवाहा ने जदयू की सदस्यता ग्रहण कर ली. काफी समय से क्षेत्र में उनकी सीएम नीतीश कुमार के साथ नजदीकियों की चर्चा थी.

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पिछली बार उन्होंने भाजपा के कद्दावर नेता माने जाने वाला जवाहर प्रसाद कुशवाहा को हराया था. 1995 से लेकर 2015 तक विधानसभा चुनाव की लड़ाई अशोक और जवाहर प्रसाद के बीच ही रही. जवाहर प्रसाद 1990, 1995, 2005 फरवरी, 2005 अक्टूबर और 2010 में भाजपा के टिकट पर विजय पताका लहराया. इनमें से 1990 को छोड़कर जवाहर ने हर बार अशोक को शिकस्त दी जबकि 2000 और 2015 में जवाहर को हराकर अशोक विधानसभा की दहलीज तक पहुंचें.

अशोक बनाम जवाहर

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सासाराम भाजपा की परंपरागत सीट मानी जाती है. डॉ अशोक कुमार को स्वयं नीतीश कुमार पहल कर जदयू में लेकर आए हैं, ऐसे में उनके टिकट पर किसी तरह का कोई सस्पेंस नहीं हो सकता है लेकिन बात करें अगर जवाहर प्रसाद की तो उनका भी सीधा संबंध उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी से है.

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वहीं जवाहर प्रसाद संघ परिवार के भी चहेते हैं. वजह भी है, जवाहर प्रसाद इस पूरे क्षेत्र में हिंदुत्व की राजनीति के प्रतीक माने जाते हैं. जिस दौर में पूरे बिहार में लालू लहर चलती थी, वैसे समय में भी उन्होंने सासाराम में भाजपा का परचम लहराया था. ऐसे में जवाहर प्रसाद को भी हल्के में लेना भूल होगी. वहीं जवाहर प्रसाद के छोटे पुत्र राणा प्रताप राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक भी हैं. संघ का भाजपा पर वर्चस्व भी किसी से छिपा हुआ नहीं है.

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हालांकि एक तथ्य यह भी है कि इसी इलाके की काराकाट लोकसभा सीट से रालोसपा प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा भी चुनाव लड़ते हैं. कुशवाहा समाज में उपेंद्र कुशवाहा की लोकप्रियता हाल के दिनों में बढ़ी है. नीतीश कुमार ने इसी के काट में राजद विधायक अशोक कुमार को अपने पाले में कर लिया है. जब सीधा नीतीश कुमार ही अशोक कुमार को अपने साथ लेकर आए हैं तो जाहिर तौर पर एनडीए की ओर से अशोक कुमार ही जदयू उम्मीदवार के तौर पर अब सासाराम सीट से मैदान में होंगे.

कुशवाहा समाज का अभेद्य किला

Kushwaha

सासाराम विधानसभा क्षेत्र के सामाजिक समीकरणों पर गौर करें तो यहां बड़ी तादाद में कुशवाहा, वैश्य, मुस्लिम और कुछ हद तक राजपूत बिरादरी की आबादी मानी जाती है. वैसे बीते कुछ दशकों में सासाराम कुशवाहा समाज का अभेद्य किला बन चुका है. वजह भी है कि यहां दोनों प्रमुख पार्टियां कुशवाहा उम्मीदवार ही उतारती रहीं हैं. वर्ष 2010 में यहां से कांग्रेस अकेले चुनाव लड़ी तो उसने भी कुशवाहा उम्मीदवार राजशेखर को ही मौका दिया.

राजद में किसकी बारी

पिछले बार ही तेजस्वी यादव के करीबी राजद नेता संजय कुमार सिंह का टिकट फाइनल हो चुका था, जो किसी वजह से आखिरी दौर में कट गया क्योंकि अशोक कुमार राजद के प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद के शिष्य माने जाते थें. संजय कुमार सिंह दोबारा रेस में स्वतः आ गए हैं जबकि जगदानंद के नए नए शार्गिद बनें युवा राजद नेता शिवंत कुमार कुशवाहा भी अब राजद उम्मीदवार की दौड़ में आगे आ गए हैं.

एमबीए डिग्री होल्डर शिवंत पारिवारिक तौर पर राजनीतिक पृष्ठभूमि से आते हैं. उनके पिता ईश्वरचंद कुशवाहा कई बार जदयू के जिलाध्यक्ष रह चुके हैं. वो भी पिछली दफा जदयू से विधानसभा के संभावित उम्मीदवार थें. स्थानीय कुशवाहा समाज के वोटों को साधने की नीयत से राजद शिवंत कुशवाहा पर भी दांव लगा सकता है. शिवंत कुशवाहा के बहाने राजद सासाराम के युवा नेताओं को भी साधने की रणनीति पर काम कर सकता है. बहरहाल, राजद में किसकी किस्मत चमकती है, ये भविष्य के गर्भ में है.

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