फुटपाथ पर अंडा बेचने वाला जावेद अख्तर आज है मल्टीनेशनल कंपनी का अफसर

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शिक्षा हासिल करना गरीब लोगों के लिए लोहे के चना चबाने जैसा है. हर कदम आगे बढ़ते-बढ़ते नीचे गिरने और फिर वही मज़बूरी की जिंदगी का खौ’फ तबतक होता है जबतक मंजिल हासिल नहीं हो जाती। जब परिवार का सहयोग ना हो या परिवार असमर्थ हो तब जिसकी जिम्मेवारी आगे आती है वह है समाज और देश। एक ऐसे शख्स का जीवन या उसकी प्रगति जिसे देने में समाज ने अहम भूमिका निभाई है। उसका एक उदाहरण पटना के जावेद हैं. पटना के जावेद अख्तर ने यह कहा है कि “आज वे जो कुछ भी हैं, मददगार की वजह से ही हैं। “

पटना के निवासी जावेद अख्तर (Javed Akhtar) का घर पाटलिपुत्र मोहल्ले के झुग्गी-बस्ती में बनी झोपड़ी है। पटना के सड़कों के किनारे अण्डा बेचने वाले जावेद अख्तर आज मल्टीनेशनल कंपनी में अफसर हैं। वे अपनी जिंदगी के उस अनजान लम्हों के बारे में बताते हैं जिनसे लोग अनजान हैं और जिसे जानकर संघर्षरत व्यक्ति से लेकर समाज तक को प्रेरणा मिलती है। एक दिन वे पिता जाकिर आलम के साथ फुटपाथ पर अंडा बेच रहे थे तभी उनपर लोयला स्कूल के ब्रदर जेम्स की नजर पड़ी और उन्होंने उसे स्कुल में पढ़ने का प्रस्ताव दिया। पिता के पास पैसे का अभाव था तो ब्रदर जेम्स ने ही सारा खर्चा उठाया और वे स्कुल के कक्षा में पहुँच गए और फिर वहाँ पुस्तक की आवश्यकता को भरत सिंह (Bharat Sinh) ज्ञान गंगा पब्लिकेशन के मालिक ने मुफ़्त में किताब देकर पूरा किया।
इसी प्रकार वे 12 वीं तक की परीक्षा पूरी करके जेईई की तैयारी में लग गए. लोंगो द्वारा दिए गए सहयोग, अपनी कड़ी मेहनत और उज्जल भविष्य का सुनहरा सपना उन्हें हमेशा आगे ही बढ़ाता रहा और सफलता मिलती चली गयी। वे जेईई में चयनित हो गए और निःशुल्क परीक्षा की तैयारी कराने वाली संस्था रहमानी सुपर-30 में शामिल हो गए। परीक्षा के तीन माह पूर्व तबीयत गंभीर रूप से ख़राब होने की वजह से वे इस परीक्षा की सफल तैयारी न कर सकने की वजह से जेईई क्वालीफाई नहीं कर सके। जिंदगी का बहुत ही दुखद पल था यह, ऐसा महसुस होने लगा जैसे जिंदगी यहाँ आकर थमी नहीं हो बल्कि जिंदगी ख़त्म हो गयी हो।
शिक्षा की बात हो और शिक्षक ना आये, यह तो हो ही नहीं सकता। बाल मन हो या असफलता से टुटा हुआ दिल शिक्षक का एक शाबासी, प्रोत्साहन और हिम्मत अंतरात्मा में ऐसी दीवानगी पैदा करता है जो कुछ हासिल करके ही थमता है। अंदर ही अंदर एक ऐसी दिप जलती रहती है जो मंजिल तक पहुंचाकर अपने प्रकाश को कई गुना बढ़ा ही लेती है

शिक्षकों ने हौसला दिया और फिर वे तैयारी के लिए जुट गए। तभी उन्हें कन्हैया सिंह का सहारा मिला जिनके मदद से और जिनके निर्देशन में उन्हें अगले ही साल जेईई एडवांस में बेहतर रैंक हासिल हुआ। इसके बाद उन्होंने अपना नामांकन आइआइटी कानपुर में मैथेमैटिक्स इन कंप्यूटिंग में ले लिया। यहीं के बाद फिर वे बहुराष्ट्रीय कंपनी में चले गए। रोम में रह रहे ब्रदर जेम्स जावेद अख्तर के बारे में कहते हैं “उसकी झोपड़ी में नाले का गन्दा पानी आ जाता, पढ़ाई के लिए काफी मुश्किलें होती लेकिन कभी भी उसने बहाना नहीं बनाया। जावेद की इच्छाशक्ति गजब की थी।” जेम्स कहते हैं कि हर व्यक्ति के लिए सफलता और असफलता के आकलन का अपना-अपना तरीका होता है परन्तु यह सत्य है कि मेहनत करने वालों के साथ हमेशा एक शक्ति होती है।

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