ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम का क्या हाल रहेगा बिहार विधानसभा के चुनाव में

0
333

बिहार में 60 से ज्यादा विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम मतदाता ही जीत हार तय करते हैं. एकाध अपवादों को छोड़ दें तो इन सीटों पर कमोबेश राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस का ही वर्चस्व रहता आया है. इनमें से उदाहरण के तौर पर किशनगंज विधानसभा सीट को देखा जा सकता है.

ये सीट एक तरह से कांग्रेस का गढ़ हुआ करती थी. कांग्रेस अकेले चुनाव लड़े या फिर गठबंधन में. किशनगंज सीट कांग्रेस की परंपरागत सीट हो गई थी. जिस दौर में बिहार की 243 सीटों में से महज 04 सीटें कांग्रेस को हासिल हुई थी, उस दौर में भी किशनगंज ने कांग्रेस का साथ नहीं छोड़ा था.

लेकिन अब परिस्थितियां बदल गई है. मुस्लिम बहुल किशनगंज पर अब ओवैसी की पार्टी एमआईएम का कब्जा हो चुका है. 2019 के लोकसभा चुनाव में जब देश में और बिहार में भाजपा और जदयू के गठबंधन की सुनामी चल रही थी, उस दौर में ओवैसी की पार्टी को इस सीट पर सवा दो लाख से भी ज्यादा वोट हासिल हो गए थें.

वहीं जब यहां से कांग्रेस के टिकट पर जीतने वाले विधायक डाॅ जावेद जब सांसद हो गए तब इस सीट पर उपचुनाव हुआ. एमआईएम ने मुकाबले को त्रिकोणिय बना दिया. दिलचस्प मुकाबले में एमआईएम प्रत्याशी कमरुल होदा ने भाजपा प्रत्याशी स्वीटी सिंह को 10 हजार से भी ज्यादा वोटों से हरा दिया और कांग्रेस प्रत्याशी को तीसरे नंबर से संतोष करना पड़ गया. उसके बाद से ही बिहार में ओवैसी समर्थकों के हौंसले सातवें आसमान पर है.

2015 के विधानसभा चुनाव में भी ओवैसी की पार्टी ने करीब 24 मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में अपने उम्मीदवार उतारे थें लेकिन महागठबंधन की आंधी में एमआईएम के सभी उम्मीदवार जमींदोज हो गए थें.

बिहार में करीब 17 प्रतिशत मुस्लिम वोटर हैं. यही वजह है कि एमआईएम को बिहार की राजनीति में अपने लिए काफी संभावनाएं नजर आती है. खास तौर पर भाजपा और एनडीए के लिए तो ओवैसी किसी तोहफे से कम नहीं है क्योंकि इन दिनों बिहार के मुस्लिम नौजवानों में ओवैसी का काफी क्रेज है. किशनगंज विधानसभा उपचुनाव में जीत हासिल करने के बाद एमआईएम के हौंसले बुलंद है.

ओवैसी 2015 के विधानसभा चुनाव से ही बिहार की राजनीति में सेंधमारी करने के लिए बेकरार थें और उनका यह सपना किशनगंज उपचुनाव जीत कर पूरा भी हो गया. जाहिर है कि अब ओवैसी की महत्वाकांक्षा बिहार में अपना जनाधार, अपना वोट शेयर और अपनी सीट बढ़ाने पर होगी.

एक बात तो तय है कि बिहार की राजनीति में ओेवैसी जितना ज्यादा मजबूत होंगे, महागठबंधन को उतनी ही मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा. किशनगंज विधानसभा सीट जीतने के बाद ही एमआईएम की बिहार यूनिट के अध्यक्ष अख्तरुल ईमान ने बयान दिया था कि हम आने वाले बिहार विधानसभा के चुनाव में सभी 243 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेंगे.

हालांकि कई मुस्लिम बुद्धिजीवी और पढ़े लिखे लोग ओवैसी को आरएसएस का मुस्लिम वर्जन बताते हुए कहते हैं कि राजनीति में किसी भी प्रकार की कट्टर विचारधारा का मजबूत होना न तो समाज के लिए अच्छा है और न देश के लिए. फिलहाल, बहुत कुछ समय के गर्भ में छिपा हुआ है. आगे क्या होगा, इसके लिए अभी कुछ वक्त आपको इंतजार करना होगा.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here