पंकज त्रिपाठी ने अपने गांव के छठ को याद करते हुए कही ये बड़ी बात

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हिंदी सिनेमा के लोकप्रिय अभिनेता पंकज त्रिपाठी इस बार छठ पूजा में अपने घर गोपालगंज नहीं आने पर दुःख व्यक्त किया है. उन्होंने कहा कि हमें बचपन का वो सब कुछ याद है जब हम दिपावली से छठ तक को कैसे एक उत्सव के रूप में मनाते थे. आज काम के चलते न दिपावली और न ही छठ पर्व में घर आने का मौका मिल पाता है. इस बार दिपावली से पहले घर तो चला गया लेकिन बहुत दिनों तक घर भी नहीं रुक सका…

पंकज त्रिपाठी दशहरा से दिपावली का जिक्र करते हुए कहते हैं कि कुछो नहीं भूले हैं. सब याद है. दशहरा खत्म होते ही मन-मिजाज छठ जइसा होने लगता था. हवाओं में उत्सव की खुशी… गांव-घर में सफाई अभियान… दिवाली की लिपाई-पोताई… कुम्हार के घर दउड़-दउड़ के जाना… दीया लाना… कोसी लाना… फिर दिवाली में दियरी जराना… फिर छठ की तैयारी… नया कपड़ा सिलवाने का उत्साह… टेलर्स के पास बाबूजी या भैया के साथ जाना… और यह सोचना की जिलेबी कब खिलाएंगे. सच कह रहा हूं, कपड़ा सिलवाना तो एक कारण था ही, माधोपुर बाजार (गोपालगंज) जाकर मिठाई खाने का भी इंतजार रहता था. फिर छठ के दिन नयका कुर्ता पहिन के घाट पर पूरे ठाठ से जाते थे. अउर घाट का बात तो पूछिए मत. गजबे माहौल. सच कहिए तो घाट पर 15-20 दिन पहिले से ही माहौल बना रहता था. गांवभर का लड़का लोग अपना-अपना घाट छेकता था. हमहू घाट बनाते थे. दउड़-दउड़ के नदी में से पानी लाते थे. घाट बनाने का एक अलगे मजा होता है. हरेंद्र, राजन, मनोज सब संघतिया मिलके हमलोग घाट सजाते थे. केला का थम काटकर लाते थे. तिलंगी साटते थे और जब शाम होते मरकरी बरता था, तो मन अइसे खुशी से भर जाता था कि का कहें.

उन्होंने छठ महापर्व को लेकर कहा कि छठ प्रकृति का पर्व है, यह बात बाद में समझ में आया. हमारी मां (हेमवंती देवी) छठ करती थी. लकड़ी के कठवत में ठेकुआ का आटा माड़ती थी. इस पर्व में शुद्धता-पवित्रता तो जगजाहिर है. और इन सबके बीच छठ मइया का गीत… गीत में सब परिवार का नाम… मुझे याद है चाचा के परिवार से हम लोगों का अनबन चलती थी, लेकिन मां, छठ गीत में सबका नाम लेती थी. छठी मइया से सबके लिए अन-धन मांगती थी.

छठ का अर्घ्य देने के लिए पूरा गांव गंडकी नदी किनारे जुटता था. दूसरे दिन यानी परणा के दिन हमारे गांव में नाटक होता था. गांव के राघव शरण तिवारी खुद नाटक लिखते थे और डायरेक्ट करते थे. तब मैं नौवां क्लास में पढ़ता था और इसी मंच पर पहली बार नाटक किया और यहीं से ‘पंकज त्रिपाठी’ नामक युवक की यात्रा शुरू हुई. या यों कहिए कि छठ पर्व से ही मेरे अभिनय की शुरुआत हुई.

अब भाभी (रीता तिवारी) छठ करती हैं. आज मैं राजस्थान के मंडवा गांव में शूटिंग के लिए जा रहा हूं. लेकिन गांव याद आ रहा है. दिवाली पर घर गया था. काम के कारण जल्दी मुंबई आना पड़ा. लेकिन इस बार लकड़ी का कठवत गांव से लेकर आया हूं. हम बिहारी भले कहीं रहेंगे, लेकिन अपने गांव-घर-छठी मइया को कैसे भूल सकते हैं.

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