शिक्षक दिवस विशेष : नि:शुल्क शिक्षादान कर छात्रों को ऊंची उड़ान दे रहे प्रो. दीनानाथ मेहता

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वर्त्तमान दौर में जहां शिक्षा का व्य’वसायीकरण हो गया है। अधिकतर लोग इस आ’ड़ में मोटी कमाई भी कर रहे हैं। लेकिन, इस दौर में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो शिक्षा के प्रति समर्पित होकर शिक्षा दान को महादान मानते हैं। ऐसे ही चंद लोगों में एक हैं मधेपुरा के रसायन विज्ञान शिक्षक प्रो. दीनानाथ मेहता।

उनके लिए शिक्षा दान से बढ़कर कुछ भी नहीं है। शिक्षा को वे साधना मानते हैं। उनका कहना है कॉलेज से मिला वेतन परिवार चलाने के लिए काफी है तो विद्यार्थियों से पढ़ाने के एवज में फी’स क्यों लिया जाए। प्रो. दीनानाथ 35 वर्षों से लगातार कोसी क्षेत्र के हज़ारों छात्र-छात्राओं को मुफ्त दान कर रहे हैं।

प्रो. दीनानाथ मेहता

1985 से छात्रों को पढ़ा रहे हैं प्रोफ़ेसर दीनानाथ :

वे बताते हैं कि वर्ष 1985 में मधेपुरा के बीएनएमवी कॉलेज (कॉमर्स कॉलेज) में सहायक प्रोफेसर के पद पर नियुक्त हुए। तब से वे कॉलेज में पढ़ाने के साथ-साथ घर पर भी छात्र-छात्राओं को नि:शुल्क शिक्षादान करते आ रहे हैं। 2017 में बीएनएमयू में डिप्टी रजिस्ट्रार बनने के बाद कई तरह व्यस्ताओं के बावजूद वे अनवरत इस कार्य में लगे हुए हैं। लगभग 60 वर्ष के हो चुके प्रो. मेहता प्रतिदिन अपने घर पर 100 से अधिक विद्यार्थियों को पढ़ाते हैं।

शिक्षा देने वाले शिक्षकों को चाहिए कि वे शिष्यों के प्रति समर्पित हो

उनके पिता शिवगुलाम मेहता भी एक शिक्षक थे। उन्हीं से प्रभावित होकर उन्होंने शिक्षा देने की सोची। वे कहते हैं कि शिक्षा दान से बड़ा कोई दान नहीं है। इसमें उन्हें आत्म संतुष्टि मिलती है। शिक्षा सभी के लिए आवश्यक है। शिक्षा के विकास के साथ ही समाज व देश को मजबूती मिल सकती है।

छात्रों के साथ प्रो. दीनानाथ

पढ़ाने के दौरान विद्यार्थियों को रसायन विज्ञान के गूढ़ रहस्यों के साथ-साथ जीवन जीने की कला भी सिखाते हैं। प्रो. मेहता बताते हैं कि आर्थिक व शैक्षणिक रूप से पिछड़े इस कोसी क्षेत्र के अभिभावक अपने बच्चों को पढ़ने के लिए शहर तो भेज देते हैं, लेकिन पैसा के अभाव में छात्र गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाते हैं।

छात्रों के इसी परेशानी को देखते हुए उन्होंने मुफ्त में पढ़ाने की बात सोची। उनका कहना है कि आज सबसे पहले शिक्षा देने वाले शिक्षकों को चाहिए कि वे शिष्यों के प्रति समर्पित हो। जिससे कि प्रत्येक शिक्षक का शिष्य अर्जुन बनकर समाज में फैली व्याप्त बुराईयों को समाप्त कर शिक्षित समाज निर्माण में अपनी अहम भूमिका निभा सके।

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