रतुआ नामक रोग से सुरक्षा करती है गेहूं को, A.P.R जीन

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नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय पादप आनुवांशिक संसाधन ब्यूरो तथा भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान और करनाल स्थित भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने कई अन्य विश्वविद्यालयों के शोधकर्ताओं के साथ मिलकर गेहूं के रोग प्रतिरोधी जीन्स की खोज की.

गेंहू की खेती में गेहूं के पत्तों में रतुआ नामक रोग पनप जाता है जिससे फसल की बर्बादी तय है। इन समस्याओं से निपटने के लिए ही वैज्ञानिकों ने एक ऐसी जीन्स की खोज की है जिसमे इस रोग से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता होती है. इस किस्म के विकास से पौधों में रतुआ रोग पनपेगा ही नहीं और खेती लहलहायेगी। एक अध्ययन किया गया , इसमें गेहूं के जर्म प्लाज्म भंडार के 6,319 नमूनों में से 190 नमूने देश के 10 अलग-अलग गेहूं उत्पादक क्षेत्रों से लाये गए और उनका अवलोकन किया गया जिसमें A.P.R जीन की पहचान हुयी फिर उनके प्रतिरोधक क्षमता और गुणवत्ता क्षमता का अवलोकन किया गया और पाया गया कि 190 में से 49 नमूने में 2 से 3 A.P.R जीन पाए गए। फिर 8 विभिन्न स्थानों पर परिक्षण किया गया जिसमें 8 नमूने ऐसे थे जो प्रतिरोधी के साथ ही साथ लम्बे समय तक टिकाऊ और उपयोगी थे। 52 नमूनों में A.P.R जीन नहीं पाए गए परन्तु उनकी प्रतिरोधकता मजबूत थी।

ये जीन विकसित पौधों में देखने को मिलते हैं। बीज अंकुरित होने से लेकर पौधे पनपने और फिर उनके वृद्धि और विकास में इनकी काफी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। पौधे के विकास के विभिन्न प्रक्रिया में इस जीन की प्रतिक्रिया में काफी बदलाव होने लगते हैं एक A.P.R जीन की प्रभावित या रतुआ रोग से सुरक्षित करने की क्षमता सीमित होती है लेकिन 2 या 3 में ऐसा नहीं होता है।

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