बिहार के इस रेडलाइट एरिया में जल रही है शिक्षा की ज्योति, ‘सफी उल्लाह’ दे रहे हैं तालीम

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रेडलाइट एरिया, जिसके बारे में तो हर कोई जानना चाहता है, पर इस बस्ती में रहने वाले लोगों के मजबूरी और घुटन के बारे में शायद ही कोई ऐसा लोग होगा जो जानना पसंद करेगा। परंतु, इस भरी दुनिया में “सफी उल्लाह” जैसे कुछ फ़रिश्ते भी उपस्थित हैं जो इस मोहल्ले में रहने वालों के लिए अच्छा करने के लिए आगे का कदम उठाते हैं। जी हाँ, हम आपको बता रहे हैं, बिहार के सीतामढ़ी के बदनाम गली के बारे में जहाँ पर लोग कदम रखने से भी कतराते हैं। उस गली में सफी उल्लाह जैसे लोग पिछले 12 साल से शिक्षा की ज्योति जला रहे हैं। तबायफ़ों के बच्चों को शिक्षा देने वाले सफी उल्लाह आज युवाओं के रोल मॉडल बन गए हैं। सफी उल्लाह के इस कोशिश से न केवल उनके बच्चे शिक्षित हुए हैं, बल्कि उनके अंदर कुछ बनने या कुछ करने का जज़्बा भी जग गया है।

ये मोहल्ला 80 साल पहले बना था

बिहार के सीतामढ़ी शहर के वार्ड नंबर नौ यानि बोहा टोला, जिसको लगभग 80 साल पहले बसाया गया था। ये बदनाम गली में करीब 300 परिवार रहते हैं और अपना गुजारा करते हैं। ये बदनाम बस्ती जिसे आज़ादी से पहले बसाया गया था, यहाँ आज भी रहने वाली महिलाएं नाच-गाना और मुजरा करके अपना गुजरा करने को मजबूर हैं। समाज में खुद को इज़्ज़तदार बताने वाले लोग अपना गम मिटने तो इस बस्ती में जाते हैं, पर यहाँ के लोगों को अपने एरिया में देखना पसंद नहीं करते हैं। समाज के इस दोहरे चरित्र और दोहरे रवैये के वजह से इस मोहल्ले के बच्चे शिक्षा से दूर रह जाते हैं। यही बात कचहरीपुर गांव में रहने वाले सफी उल्लाह के दिल में ‘गले की फँसी हुई हड्डी’ के जैसे बैठ गयी, उसके बाद शुरुआत हुई एक बेमिशाल सफर की।

ये मुहीम 12 साल पहले शुरू हुई

सफी उल्लाह ने सोचा की इस आज़ाद देश में कोई भी बच्चा शिक्षा के अधिकार से दूर कैसे रह सकता है? इसके लिए सफी उल्लाह ने स्वयं ही यहाँ रहने वाले बच्चों को शिक्षा देना शुरू कर दिया। सफी उल्लाह ने इस बात को लेकर मन बना लिया कि यहाँ के बच्चों को पढ़ाकर उनका ना ही केवल आने वाले समय को बेहतर करेंगे, बल्कि उनके ख़्वाबों को पंख लगाएंगे। पिच्छले 12 वर्ष से यहाँ के बच्चों को सफी उल्लाह उर्दू भाषा की बेहतरीन तालीम देने में लगे हुए हैं।

Source: https://biharstory.in/2019/05/bihaar-ke-is-badanaam-galee-ke-bachchon-mein-shiksha-kee-jyot-jala-rahe-hain-saphee-ullaah.html#.XNHZJ_lKjcc

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