जानिये पटना के एक ऐसे शख्स के बारे में, जिसका लंदन में चलता था कारोबार

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पाटलिपुत्र के नाम से प्रसिद्द पटना की स्थापना 490 ईसा पूर्व में मगध सम्राट अजातशत्रु ने किया था। कालांतर में पाटलिपुत्र मगध, नंद, मौर्य, शुंग, गुप्त और पाल साम्राज्यों की राजधानी बनी। दुनिया के उन सबसे पुराने शहरों में से एक गंगा किनारे बसा पटना है, जिनका एक क्रमबद्ध इतिहास रहा है। पाटलिपुत्र मौर्या काल में सत्ता का केंद्र बन गया था। उत्सुकता के साथ विदेशी पर्यटक और यात्री पटना आते हैं। उनके संस्मरणों में, फिर पटना जीवंत हो उठता है। उनके संस्मरण और कई अन्य दिलचस्प विवरण लेखक और पत्रकार अरुण सिंह की पुस्तक (पटना- खोया हुआ शहर) में उपलब्ध हैं। प्रस्तुत है इस पुस्तक में ब्रिटिश महिला लेखिका एम्मा रॉबर्ट्स की यात्रा वृतांत का एक छोटा सा हिस्सा:-

एम्मा रॉबर्ट्स अपनी बहन और उसके पति कैप्टन नहटन के साथ 1828 के फरवरी में अपनी मां के निधन के बाद हिंदुस्तान आयी थी। कैप्टन नहटन बंगाल आर्मी में थे। इसी श्रृंखला में एम्मा का पटना आना हुआ था। चार्ल्स डी’ऑयली ने पटना में एम्मा की मेजबानी किया। उन्होंने 19वीं सदी के तीसरे दशक के तत्कालीन बिहार और खासकर पटना का एक दक्ष पर्यवेक्षक की तरह बड़ा ही अंतरंग चित्रण किया है। उन्होंने विस्तृत तरीके से पटना के बारे में तो लिखा ही है, लेकिन सबसे रोचक वर्णन उन्होंने दीघा में रह रहे एक अंग्रेज व्यवसायी मिस्टर हॉवेल के कारोबार के बारे में किया है। उन्होंने लिखा भी है, “मैं मिस्टर हॉवेल के बारे में अगर पटना का वर्णन करते हुए नहीं लिखूं तो यह सतही और अधूरा ही रहेगा।”

मिस्टर हॉवेल एक अंग्रेज कारोबारी था जो दीघा में डच शैली में बनी एक भव्य इमारत ‘द वाइट पिलर हाउस’ (वर्तमान में यह भवन दीघा, बाटा के अधीन है)। दीघा में उसने एक विशाल फार्म बना रखा था। एम्मा ने आगे लिखा है, “हॉवेल दीघा में काफी बड़े पैमाने पर अपना कारोबार चला रहे हैं जिसकी तुलना पूरे हिंदुस्तान में कोई और ब्रिटिश कारोबारी नहीं कर सकते हैं।” उन्होंने लिखा है, “हिलसा मछली पकड़ने के लिए हुगली नदी के मुहाने तक जाती है। उसे ठीक से तैयार करके हिंदुस्तान के हर हिस्से में उसके बाद भेजा जाता है। उसके फार्म का तैयार किया हुआ चटनी, सॉसेज बेकन, हैम्स, आदि बड़े पैमाने पर कलकत्ता भेजे जाते हैं। कलकत्ता से ये लंदन तक भेजे जाते हैं। इंग्लैंड में तैयार ऐसे खाद्य पदार्थों से इनकी गुणवत्ता किसी भी तरह से कम नहीं होती है। वाइन बनाने में भी हॉवेल ने अपने हाथ आजमाए हैं। हालांकि यह बहुत उम्दा नहीं है। लेकिन फिर भी वैसा बुरा भी नहीं है कि उसे चखा ना जा सके।”

एम्मा ने लिखा है, “हजारों की संख्या में लोग अलग-अलग विभागों में दीघा फार्म में पूरे साल काम करते हैं। एक बहुत बड़ी रकम इन्हें वेतन के रूप में निश्चित रूप से दिया जाता होगा।” उसका कारोबार हॉवेल के निधन के बाद जल्द ही बिखर गया। चैनपुर के राजा ने हॉवेल के ‘द वाइट पिलर हाउस’ को खरीद लिया। इसे जूता बनाने वाली कंपनी बाटा ने उनसे खरीद लिया। तब से यह उसके मैनेजर का निवास स्थान है। इसी घर में अंग्रेजी के प्रख्यात लेखक विक्रम सेठ का बचपन बीता था। बाटा कंपनी के मैनेजर उनके पिता हुआ करते थे।

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