धोती और कुर्ता, पैर में हवाई चप्पल, कंधे पर गमछा, मुस्कुराता चेहरा, गरीबों की आवाज ऐसे थे रघुवंश बाबू

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रघुवंश बाबू को याद कर आज पूरा प्रदेश शोक में डुबा हुआ है. उनका पार्थिव शरीर उनके पातृक गांव में लागा गया है जहां उनका राजकिय सम्मान से अंतिम संस्कार किया जाएगा. आज हर कोई अपने प्रिय नेता को देख लेना चाहता. रघुवंश बाबू को देखने के लिए एक जनसैलाब उमड़ पड़ा है. और हो भी क्यों नहीं, रघुवंश बाबू नेता नहीं, जन प्रतिनिधि नहीं एक गारजियन थे, उनकी निगाह पर किसी पर बराबर होती थी. वे भले ही सवर्ण जाती से आते हो लेकिन उन्होंने सदा अतिपिछड़ा, पिछड़ा और अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के लोगों के लिए मुखर होकर बोले हैं. आज अपने प्रिय नेता को देख लेने की चाह हर किसी को है.

रघुवंश बाबू हमेसा दपदप धोती और कुर्ता. पैर में हवाई चप्पल. कंधे पर गमछा. अगर ठंढ़ का मौसम है तो खादी की चादर. हमेशा मुश्कुराता चेहरा. हर किसी के लिए हमेशा खुला दरवाजा. भाषण देते तो लोगों के दिलों में उतर जाते थे. वहीं ठेंठ गवई अंदाज. जिसे सुने तो सुनते रहे. एक दम सादा जीवन. ऐसे थे रघुवंश बाबू.

वैशाली कई मामलों में एतिहासिक है. जब देश दुनिया में गणतंत्र की बात आती है तो सबसे पहला नाम वैशाली का आता है. यहां बुद्ध का तीन बार आगमन हुआ है. सत्य अहिंसा के पुजारी बुद्ध की ही तरह रघुवंश बाबू भी हमेशा अपनी बेबाकि के लिए जाने जाते है. रघुवंश बाबू पांच वार वैशाली से सांसद रहे. वे सदा वैशाली के लिए सोचते रहे. उनकी सादगी ऐसी थी कि आज तक उनपर एक आंच तक नहीं आई है. जिस पार्टी को अपने निधन से कुछ दिन पहले उन्होंने छोड़ा था उनके कई नेता अभी भी जेल में है लेकिन रघुवंश बाबू पर एक आंच तक नई आई. देश की राजनीति में ऐसे बहुत कम ही नेता है जिनपर कोई दाग नहीं हो. उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी गरीबों के हक की लड़ाई में बिता दिया. रघुवंश बाबू जब सत्ता में रहे तो उन्होंने अपनी पार्टी के बड़े नेताओं को सही लगत का पहचान कराया.

रघुवंश बाबू के साथ रहने वाले बताते हैं कि उनको खाने पीने का बहुत शौक नहीं था. बस उनकी इच्छा इतनी थी को लोग हंसते रहे मुस्कुराते रहें. उनके पेट में अनाज हो. उनके साथ के लोग बताते हैं कि जेपी के साथ उन्होंने कई आंदोलनों में उन्होंन भूखे पेट ही अपनी रात काटी थी. जब वे सीतामढ़ी कॉलेज में पढ़ा रहे थे तो उस समय भी वे छात्र आंदोलन में छात्रों के साथ हो लेते और आंदोलन में शामिल हो जाते थे. उस समय उनकी नौकरी परमानेंट नहीं हुई थी. तो वे छात्रों के साथ बैठकर भूंजा फांका करते थे. फिर जब बाद में उनकी नौकरी परमानेंट हो गई तो फिर उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ.

रघुवंश बाबू को सबसे ज्यादा मन उनको अपने गांव में ही लगता था. यही तो वह कारण था कि जब भी मौका मिलता वे अपने गांव चले जाते थे. इतना ही नहीं जब भी अपने क्षेत्र में होते जहां होते वहां से वे लौट कर पटना या दिल्ली नहीं जाते थे सीधा गांव में ही किसी के दरवाजे पर रुक गए वहीं भोजन पानी हुआ उसके बाद फिर से आगे का सफर शुरु हो गया. जब जब सांसद बने उन्होंने सरकारी आवास में रहे उसके बाद फिर से किराये का मकान खोजने लगते थे उसमें भी सस्ता का कोई मकान मिल जाए तो सबसे अच्छी बात थी.

एम्स दिल्ली में भर्ती होने से पहले रघुवंश बाबू अपने गांव में ही रह रहे थे. वहीं बे खेती का काम देख रहे थे. उनके गांव के लोग बताते हैं कि जब वे सांसद थे तो वे गांव में ही रुक जाया करते थे. उनको गांड़ी घोड़े या बड़े मकान की कोई जरूरत नहीं थी. वे बहुत ही सादगी से अपना जीवन जीते थे. रघुवंश बाबू के निधन के बाद से पूरे प्रदेश के साथ उनके गांव के लोगों को सबसे ज्यादा दुःख है. हर कोई यही कह रहा है आप सदा याद रहेंगे रघुवंश बाबू…

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