बिहार के गौरव जो ओझल हैं आपके नजरों से, देश-विदेश में फैला रहे हैं कीर्ति!

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बिहार को भले ही पिछड़ा राज्य करार दिया गया हो लेकिन कभी भी बिहार की प्रतिभा पिछड़ी नहीं रही है. बिहार की प्रतिभा चहुंओर फैली हुई है. उनका नाम आमलोगों के बीच भले ही लोकप्रिय नहीं रही हो लेकिन उनकी प्रतिभा ने देश में अपना योगदान दिया है, बिहार का गौरव बढ़ाने के साथ ही साथ अबतक प्रेरणा देती रही है.

मन्ना बहादुर :

ये बिहार की पहली महिला है जो उपन्यासकार हैं. ये न केवल उपन्यासकार हैं बल्कि एक कवयित्री और चित्रकार भी रही हैं. 1950 से लेकर 1960 के बीच उन्होंने ऑल इण्डिया रेडियो पर बच्चों से जुड़े प्रोग्राम में मुख्य भूमिका देती थी. उनका कॅरियर मीडिया से भी जुड़ा रहा है. दुर्भाग्यवश उन्होंने आवाज खो दिया तब वे पेन्टिंग से जुड़ीं और उनकी पेंटिंग अखिल भारतीय ललित कला और शिल्प सोसायटी (AIFACS ) में 1974 में जगह मिली। 2012 में उनकी लिखी उपन्यास The Dance Of Death प्रकाशित हुई जिसे स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय में जगह मिली।

इस उपलब्धि के बाद इनका नाम विकिपीडिया पर बिहार की प्रथम महिला उपन्यासकार के रूप में दर्ज किया गया. 2007 में उनका एक उपन्यास नीलंजना प्रकाशित हुआ. अक्स मेरे जज्बात और धूप-छाँव कविता संग्रह हैं। गीत और गजल भी उनका प्रकाशित हुआ. वह फरीदाबाद में रहती हैं और पटना की रहने वाली हैं. उन्होंने कई पुरस्कार भी जीते हैं. स्कूल के दिनों से ही वे कविता लिखा करती थी।
वे कहती हैं कि कोई विचार या कोई भाव जो मेरे दिल-दिमाग को छूटे हैं और मैं उसमें खो जाती हूँ वही स्थिति मुझे लिखने के लिए प्रेरित करती है.

उपमन्यु चटर्जी :

वे 1983 बैच के महाराष्ट्र कैडर के भारतीय प्रशसनिक पदाधिकारी रह चुके हैं. उनका जन्म 1959 में पटना में हुआ था। इंग्लिश अगस्त एक उपन्यास है जिसमें एक भारतीय कहानी का जिक्र किया गया है। यह 1988 में प्रकाशित हुई थी. 1994 में इसी नाम से इस उपन्यास पर फ़िल्म भी बनाया जा चुका है. इस कहानी में एक सिविल सर्विस ऑफिसर की कहानी को बयां किया गया है जो ग्रामीण क्षेत्र में पोस्टेड है। उन्होंने लेखन के क्षेत्र में कई पुस्तकें और कई उपन्यास लिखा है। 2009 में, उन्हें “समकालीन साहित्य में उनके अनुकरणीय योगदान” के लिए ऑफिशियर डे ल’ऑर्ड्रे डेस आर्ट्स एट देस लेट्रेस से सम्मानित किया गया था। इसके अलावा 2010 में द हिंदू बेस्ट फिक्शन अवार्ड के लिए उपन्यास वे टू गो को शॉर्टलिस्ट किया गया था।

अमिताव कुमार :

ये बिहार के आरा से हैं। आरा भोजपुर जिला का मुख्यालय है. उनका जन्म आरा में 17 मार्च 1963 को हुआ था. उन्होंने 1984 में हिन्दू कॉलेज दिल्ली से राजनीती शास्त्र में स्नातक उत्तीर्ण किया। उन्होंने साहित्य में स्नातकोत्तर और डॉक्टर की उपाधि हासिल की और वर्तमान में न्यू यार्क में रह रहे हैं. उन्होंने लेखन के अतिरिक्त पत्रकारिता में भी योगदान दिया है। उन्होंने साहित्य से जुड़ी कई किताबें लिखी हैं. होम प्रोडक्ट्स उनका लिखा उपन्यास है। लेखन क्षेत्र में उनकी उपलब्धि को देखते हुए कई पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है. 2016 में उन्हें गुगेनहाइम फ़ेलोशिप से सम्मानित किया गया. लगातार तीन वर्षों तक दक्षिण एशियाई पत्रकार संघ से पुरस्कृत किया जा चुका है. इसके अलावा, उन्हें NEH, येल यूनिवर्सिटी, स्टोनी ब्रुक यूनिवर्सिटी, डार्टमाउथ कॉलेज और यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया-रिवरसाइड से रिसर्च फेलोशिप से सम्मानित किया गया है। इसके अतिरिक्त उन्होने जज भी किया है.

ताबिश खैर:

ये बिहार के गया जिले के निवासी हैं। इनका जन्म वर्ष 1966 में हुआ था. इन्होंने द टाइम्स ऑफ इंडिया में रिपोर्टर के तौर पर भी कार्य किया है. वे डेनमार्क के आरहूस विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं। 1995 में उन्हें पोइट्री सोसाइटी के तरफ से सम्मानित किया गया था. उन्होंने अपनी कुछ कविताओं के लिए अखिल भारतीय कविता पुरस्कार और हांगकांग के बैप्टिस्ट विश्वविद्यालय से रचनात्मक लेखन में एक मानद फैलोशिप प्राप्त की है। उनके शैक्षणिक पत्र, समीक्षाएं और निबंध विभिन्न प्रमुख पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में छपे हैं। वे अब आरहूस, डेनमार्क में रहते हैं।

सुचित्रा भट्टाचार्य :

उनका जन्म 10 जनवरी 1950 को बिहार के भागलपुर जिले में हुआ था। उन्होंने कोलकाता के प्रसिद्ध जोगमाया देवी कॉलेज से स्नातक किया था। बचपन से ही उन्हें लिखने का शौक था लेकिन स्नातक के बाद शादी होने के बाद लेखनी छूट चुका था. 1978–1979 में उन्होंने पुनः लिखना शुरू किया। वे आधी रात को उपन्यास लिखा करती थी. उपन्यास काचर देवल के प्रकाशन के बाद उनका नाम बंगला के लेखक में विशेष रूप से लिया जाने लगा. उन्होंने बांग्ला भाषा में 24 से अधिक उपन्यास लिखा और ढ़ेर सारी कहानियाँ लिखी। उनके उपन्यास और कहानियों को कई भाषा में अनुवाद किया गया. उनके द्वारा लिखित उपन्यास “दहन ” पर बांग्ला में फ़िल्म भी बनाया जा चुका है.

उन्हें कई पुरस्कारों से नवाजा गया जिसमें 2004 में कलकत्ता विश्वविद्यालय से भुवन मोहिनी पदक, 1996 में बैंगलोर से नंजनगुडु थिरुमलम्बा राष्ट्रीय पुरस्कार, दिल्ली से कथा पुरस्कार 1997, कोलकाता से 2000 में ताराशंकर पुरस्कार, 2001 में कल्याणी से द्विजेंद्रलाल पुरस्कार शामिल हैं। 2002 में भागलपुर से शरत पुरोस्कर, साथ ही भारत निर्माण पुरस्कार, 2004 में साहित्य सेतु पुरस्कार के आलावा कई अन्य पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है. उनकी मृत्यु 65 वर्ष की उम्र में 12 मई 2015 को हो गई।

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