kushwaha

बिहार में सियासी राजनीति को लेकर लगातार बयान सामने आ रहे हैं. इधर जदयू के पार्लियामेंटी बोर्ड के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा लगातार अपनी हीपार्टी के खिलाफ मुखर होकर बोल रहे हैं. बिहार में महागठबंधन की सरकार है और नीतीश कुमार उसके मुखिया है. लेकिन इसके बाद भी कुशवाहा राजद के खिलाफ बोलने से पहरहेज नहीं कर रहे हैं. हालांकि इसके पिछे कई तर्क दिए जा रहे हैं. पिछले कुछ दिनों बिहार के सियासी घटनाक्रम को अगर गौर से देखेंगे तो जब से नीतीश कुमार ने 2025 का चुनाव तेजस्वी के नेतृत्व में लड़ने की बात कही गई है. उसके बाद से कुशवाहा मुखर होकर सामने आए हैं और उन्होंने यह कह दिया कि पार्टी चाहेगी तो हम जिम्मेदारी क्यों नहीं संभाल सकते हैं. उनका इसारा डिप्टी सीएम की कुर्सी का था. खैर उन्होंने यह भी कह दिया है कि अब जदयू कमजोर होती जा रही है. इसको रोकने के लिए नेतृत्व को आगे आने की जरूरत है.

upendra kushwaha among 12 nominated to bihar legislative council

उपेंद्र कुशवाहा के हालिया बयान को अगर हम देखें तो उन्होंने शरद यादव के निधन को लेकर दिए अपने बयान में उन्होंने कहा कि आखिरी समय में मानसिक रूप से अकेले हो गए थे. उनकी खोज खबर लेने वाला कोई नहीं था. उन्होंने यहां तक कहा कि भगवान ना करे किसी को ऐसी मौत मिले. उन्होंने कहा कि जिन लोगों ने शरद यादव को बनाया उन लोगों ने अंतिम समय में उनसे बात करने तक छोड़ दिया. हालांकि इस दौरान कुशवाहा ने किसी का नाम नहीं लिया लेकिन यह सभी लोग जानते हैं कि शरद यादव लालू यादव के साथ भी और नीतीश कुमार के साथ भी रहे. ऐसे में यह कहा जा रहा है कि कुशवाहा ने अपने इस बयान से लालू और नीतीश दोनों पर निशाना साधा है. इसके बाद यह कहा जा रहा है कि उपेंद्र कुशवाहा अपनी ही पार्टी से नाराज चल रहे हैं ऐसे में वे एकबार फिर से पाला बदल सकते हैं.

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तो आइए एक नजर डाल लेते हैं उपेंद्र कुशवाहा पर उन्होंने कब कब राजनीति में पाला बदला है

उपेंद्र कुशवाला साल 2000 में पहली बार जंदाहा से चुनाव लड़ते हैं और जीतते हैं. इसके बाद वे नीतीश कुमार के काफी नजदीक भी आ जाते हैं इसके बाद साल 2004 में बिहार में जदयू और समता पार्टी एक हो जाती है. जिसमें उपेंद्र कुशवाहा को नीतीश कुमार नेता प्रतिपतक्ष बनाते हैं. लेकिन दोनों नेताओं का साथ लंबा नहीं चला और उपेंद्र कुशवाहा अपनी महत्वकांक्षाओं के कारण नीतीश से दूर होते चले गए और साल 2007 में जदयू से उनका मोह भंग हो गया. और उन्होंने राष्ट्रीय समता पार्टी बनायी. साल 2009 में हुए लोकसभा चुनाव में इन्होंने अपनी पार्टी के साथ चुनाव लड़ा जिसमें इ्नहें बुरी तरह से हार का सामना करना पड़ा इसके बाद वे फिर से नीतीश कुमार के साथ आ गए. इसका फायदा उन्हें मिला और उन्हें राज्यसभा भेज दिया गया. हालांकि साल 2013 ने उपेंद्र कुशवाहा ने नीतीश कुमार को झटका देते हुए पार्टी से बाहर हो गए और इस बार उन्होंने राष्ट्रीय लोक समता पार्टी का गठन किया. इसके बाद साल 2014 के लोकसभा चुनाव में कुशवाहा बीजेपी के साथ मिलकर चुनाव मैदान में उतरे और इन्हें मोदी लहर का फायदा मिला बिहार में तीन सीटों पर जीतने में कामयाव हो गए. इन्हें उस समय कैबिनेट मंत्री बनाया गया. लेकिन यहां भी इन्हें मन नहीं लगा और साल 2018 में इन्होंने बीजेपी से अपने आप को अलग कर लिया. और राजद कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन के साथ हो लिए. इसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में इन्हें करारी हार का सामना करना पड़ा. इसके बाद उन्होंने महागठबंधन का साथ छोड़ दिया. फिर आया साल 2020 का विधानसभा चुनाव जिसमें कुशवाहा, मायावती और ओबैसी की पार्टी के साथ मिलकर चुनाव में उतरे. जिसमें बसपा एक सीट जीतने में कामयाव रही तो वहीं AIMIM को 5 सीटें मिली बाद में बसपा का विधायक जदयू में शामिल हो गये तो वहीं AIMIM के राजद में. साल 2021 में रालोसपा का जदयू में विलय हो गया और कुशवाहा को बिहार में MLC बनाया गया साथ ही पार्टी में संसदीय बोर्ड का अध्यक्ष बनाया गया.

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ऐसे में अब कहा जा रहा है कि जिस तरह से उपेंद्र कुशवाहा राजद के विरोध में मोर्चा खोल रखे हैं. जिसके बाद से जदयू उनके खिलाफ कार्रवाई कर सकती है. हालांकि आने वाले वक्त में ही साफ हो पाएगा कि उपेंद्र कुशवाहा पार्टी से खुद बाहर जाते हैं या फिर पार्टी उन्हें निकालती है लेकिन जिस तरह के बयान सामने आ रहे है उससे यही प्रतित होता है कि अब कुशवाहा का जदयू में भी लंबे समय तक रहना ठीक नहीं लग रहा है. ऐसे में वे एक बार फिर से पाला बदल सकते हैं.

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