मंजिल की तलाश में उपेन्द्र कुशवाहा, जानिये लेक्चरर से राजनीति तक के उनके सफ़र के बारे में

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बिहार के वैशाली जिला स्थित एक छोटे से गाँव के रहने वाले उपेन्द्र कुशवाहा अब किसी पहचान के मोहताज नहीं है. सियासी महत्वाकांक्षा ने उपेन्द्र कुशवाहा को राष्ट्रीय राजनीति में एक अलग पहचान दी है. उपेन्द्र कुशवाहा राज्य से लेकर केंद्र तक अपनी सियासी सफ़र में कई पदों पर आसीन रहें लेकिन कुशवाहा को मंजिल अभी भी नहीं मिली है और मंजिल की तलाश में वो लगे हुए है. उपेन्द्र कुशवाहा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेहद नजदीक रहें. प्रधानमंत्री मोदी के भी करीब रहें और कांग्रेस से भी उनके सम्बन्ध ठीक है.

सियासत में मंजिल पाने के लिए उपेन्द्र कुशवाहा बार बार अपना रास्ता बदलते रहते है. कुशवाहा इस बात को खुले दिल से स्वीकार भी करते है. अपना सियासी सफ़र लोकदल से शुरू करने वाले उपेन्द्र कुशवाहा अभी अपनी खुद की पार्टी राष्ट्रीय लोक समता पार्टी का नेतृत्व कर रहे हैं. राजनीति में आने से पहले उपेन्द्र कुशवाहा शिक्षक थे और इस क्षेत्र से कुशवाहा को आज भी लगाव है. राजनीति में उपेन्द्र कुशवाहा किस्मत के भी धनि रहे है. उपेन्द्र कुशवाहा विधानसभा से लेकर लोकसभा तक के सदस्य रह चुके हैं. यही नहीं, उपेन्द्र कुशवाहा उच्च सदन राज्यसभा के भी सदस्य रह चुके हैं.

उपेन्द्र कुशवाहा का जन्म छः फ़रवरी 1960 को एक साधारण किसान परिवार में हुआ था. उन्होंने बिहार यूनिवर्सिटी से राजनीति शास्त्र में एमए किया. 1985 में जन्दाहा के समता कॉलेज में लेक्चरर बने.

उपेन्द्र कुशवाहा ने 1985 में राजनीति की शुरुआत की थी. 1988 तक कुशवाहा युवा लोकदल के राज्य महासचिव रहे. 1988 से 1993 तक वो राष्ट्रीय महासचिव के पद पर कार्यरत रहे. 1994 समता पार्टी के महासचिव बनने के बाद उन्हें बिहार की राजनीति में महत्व मिलने लगा. उपेन्द्र कुशवाहा लालू यादव के सामाजिक सोच के प्रशंसक थे. लालू की कांग्रेस के तरफ झुकाव के वजह से उपेन्द्र कुशवाहा उनसे दूर होते गए. उपेन्द्र कुशवाहा के पिता का कर्पूरी ठाकुर से बड़े अच्छे सम्बन्ध थे. जब उपेन्द्र कुशवाहा छोटे थे तो कर्पूरी ठाकुर उनके घर आते रहते थे. गरीबों और समाज के शोषित तथा वंचित लोगों के हितों की चर्चा हुआ करती थी. इन्ही सब बातों से प्रेरित होकर उपेन्द्र कुशवाहा राजनीति में आने का फैसला कर लिए थे.

उपेन्द्र कुशवाहा की पार्टी जिस तेजी के साथ बिहार और देश की राजनीति में आगे बढ़ी थी उतनी ही जल्दी निचे भी उतरी. वर्ष 2018 में कुशवाहा जब एनडीए से अलग हुए तब उनकी पार्टी में भी बिखराव शुरू हुआ. जहानाबाद से रालोसपा सांसद रहे अरुण कुमार ने राष्ट्रीय समता पार्टी सेकुलर नाम से एक लग पार्टी का गठन कर लिया. सीतामढ़ी से सांसद रहे रामकुमार शर्मा जदयू के साथ चले गए. पार्टी के तीनों विधायकों ने भी खुद के मूल पार्टी होने का दावा करके बगावत शुरू कर दिया. आपको बता दें कि उपेन्द्र कुशवाहा ने वर्ष 2013 में रालोसपा का गठन किया था. एक साल बाद हुए लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी एनडीए के साथ गठबंधन करके बिहार में तीन सीट लेने में कामयाब हो गई. मोदी लहर के वजह से तीनों सीटों पर इनकी पार्टी जीत हासिल करने में कामयाब हो गई. ये तीनों सीट थें काराकाट, सीतामढ़ी और जहानाबाद.

फिलहाल उपेन्द्र कुशवाहा इस बार का बिहार विधानसभा चुनाव एक अलग गठबंधन के साथ लड़ रहे हैं और इस गठबंधन के तरफ से कुशवाहा ही मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार है. इस गठबंधन में ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम भी शामिल है. तो अब देखना दिलचस्प होगा कि क्या उपेन्द्र कुशवाहा इस बार अपनी मंजिल पाने में सफल हो पाएंगे या मंजिल की तलाश आगे भी जारी रहेगी.

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