जानिए किस तरह एक महिला ने पूरे स्टेशन को मधुबनी पेंटिंग से सजा डाला

0
1387

बिहार का मधुबनी पेंटिंग भारत ही नहीं विश्व के चर्चित पेंटिंगो में से एक हैं। यहां के पेंटिंग की चर्चा विदेशों में भी होती है। आज इस पेंटिंग से मधुबनी रेलवे स्टेशन जगमगा रहा है, जिसके बदौलत आज मधुबनी स्टेशन को दूसरा सबसे खूबसूरत स्टेशन का दर्जा मिला है। स्टेशन परिसर को सजाने का काम उषा कुमारी झा की टीम ने की है। नि:शुल्क श्रमदान करके उनकी टीम ने स्टेशन परिसर में चार-चांद लगा दिया है। दीवारों से लेकर सीढ़ियों तक में यह पेंटिंग की गई है।

बिहार के दरभंगा, मधुबनी तथा नेपाल के कुछ हिस्सों की प्रमुख चित्र कला मधुबनी पेंटिंग है। बता दें कि इसकी शुरुवात रंगोली के रूप में हुई थी। समय के साथ धीरे-धीरे इसमें भी बदलाव आया और रंगोली से यह चित्रकला दीवारों, कपड़ों और कागजों पर उतरने लगा। मिथिला पेंटिंग के कलाकारों ने मधुबनी पेंटिंग व मिथिला पेंटिंग को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान दिलाने के लिए मधुबनी रेलवे स्टेशन पर लगभग तकरीबन 10,000 वर्ग फीट में मधुबनी पेंटिंग की कलाकृतियों बनाया है। यह अद्भुत कलाकृति विदेशी पर्यटकों व सैनानियों द्वारा खूब पसंद किया जा रहा है।

विरासत में मिली कला :

जिले स्थित लोहा गांव की है। उषा को यह शिक्षा अपने माता-पिता से विरासत में मिली। पारंपरिक पेंटिंग की कला पिता शेष नारायण पाठक व मां मुन्नी देवी ने सिखाया। इसके अलावा उषा ने मिथिला पेंटिंग व मधुबनी पेंटिंग का एक वर्ष का सरकारी प्रशिक्षण भी प्राप्त कर चुकी है। प्रशिक्षण प्राप्त करने के माता-पिता ने उसकी शादी मधुबनी के ही श्याम झा से कर दी। कहते न कि सब नसीब का खेल होता है। शादी के कुछ ही वर्षों में उषा की जिंदगी में वीरानगी छा गई। शादी को कुछ ही दिन हुए थे और सास, ससुर दुनिया से चल बसीं। यहीं नहीं उनके दुखों का पहाड़ तब टूट पड़ा जब उनका साथ पति भी छोड़ कर दुनिया से चल बसे। इस विषम परिस्थिति में उनको ढांढस बंधाने वाला कोई नहीं था।

मधुबनी पेंटिंग से बदली जिंदगी : 

समय के साथ उषा इस सदमे से उबरने की कोशिश करने लगी। उषा कुमारी एक योद्धा की तरह अपने जीवन के इस जंग में खुद को संभालते हुए अपने तीनों बच्चों अच्छी शिक्षा दी। पति की मौत के बाद खुद उन्होंने ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की। साथ ही सिलाई, कटाई, सिकी-मौनी बनाना भी सीखा। इन सबके साथ मिथिला पेंटिंग और मधुबनी पेंटिंग की कला उनके पास में पहले से थी हीं। चित्रकला ने उषा कुमारी झा को सहारा दिया और चित्रों की कीमत इतनी मिलने लगी कि  धीरे-धीरे जिंदगी पटरी पर लौटने लगी। उन्होंने अपने तीनों बच्चों को मिथिला पेंटिंग में दक्ष बनाया। अब इनके द्वारा बनाई गई मधुबनी पेंटिंग देश के प्रमुख स्थानों पर लगाए जाते हैं, खासकर राष्ट्रीय स्तर की प्रदर्शनियों में इनके बनाए चित्रों को काफी सराहा जाता है। मिथिला पेंटिंग के लिए उषा को वर्ष 2015 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा सम्मानित भी किया जा चुका है।

रामायण के विभिन्न घटनाओं को किया गया है चित्रित :

रामायण की विभिन्न कालखंडों पर उषा झा की टीम ने विश्वप्रसिद्ध मधुबनी पेंटिंग्स से मधुबनी स्टेशन को पूरी तरह से सजाया है। इसके तहत सीता जन्म, राम-सीता वाटिका मिलन, धनुष भंग, जयमाल व विदाई, कृष्णलीला से वासुदेव द्वारा जन्म के बाद यमुना पार कर कृष्ण को मथुरा ले जाना, माखन चोरी, कालिया मर्दन, कृष्ण रास, राधा कृष्ण प्रेमालाप, विद्यापति, ग्राम जीवन का विकास, ग्रामीण हाट, ग्रामीण खेल के चित्रण, मिथिला लोक नृत्य व पर्व-झिझिया, सामा चकेबा, छठ आदि मुख्य थीम पर पेंटिंग बनाई गई है।

कहते हैं न कि अगर मन में दृढ़ इच्छाशक्ति व आत्मविश्वास हो तो कोई भी बाधा आगे बढ़ने से नहीं रोक सकता है। उषा विपरीत परिस्थितियों से झुझते हुए आज इस मुकाम पर पहुंच चुकी हैं आज दूसरों के लिए वह प्रेरणास्रोत बन गई हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here