बिहारी पहचान 70 : बिहार कोकिला ‘विंध्यवासिनी देवी’, जिन्होंने लोकगीतों से बनायी अलग पहचान

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कहते है बिहार एक हुनरबाजों का राज्य है जहां जन्मे लोगों ने अपने हुनर और क्षमता से देश-विदेश में बिहार का नाम रौशन किया है। बिहारी पहचान के इस श्रेणी में आज हम बात करेंगे एक ऐसे ही बिहार की प्रसिद्ध लोकगायिका विंध्यवासिनी देवी की जिन्होंने अपने लोकगीतों से देश और विदेशों में नाम कमाया जिससे प्रभावित होकर भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री की उपाधि सौंपी।

 

विंध्यवासिनी देवी का प्रारंभिक जीवन
विंध्यवासिनी देवी का जन्म बिहार के मुजफ्फरपुर में हुआ था। सन 1920 में जन्मी विंध्यवासिनी देवी ने लोकगीतों के क्षेत्र में काफी ऊंचाइयों को छुआ है। विंध्यवासिनी देवी ने श्री सहादेश्वर वर्मा और श्री क्षितेश चंद्र वर्मा से संगीत की विद्या ग्रहण की। एक घटना ने उनके जीवन को पूरी तरह बदल दिया। हुआ यूँ कि किसी अवसर पर एक अन्य राज्य के व्यक्ति ने ये कह दिया कि बिहार के लोग सिर्फ खाना जानते है गाना नहीं। इस घटना ने विंध्यवासिनी देवी को अंदर तक झकझोर दिया जिसके बाद उन्होंने ठान लिया कि वो गाना जाएगी। विंध्यवासिनी देवी की शादी महज 14 वर्ष की उम्र में हो गई। सन 1945 में जब विंध्यवासिनी देवी पटना आयी तब उनके पति ने इन्हे संगीत सिखाया। उन्होंने ने मैथिली, भोजपुरी और मगही में पारंपरिक गीतों के लिए काफी चर्चित हुई है।

 

विंध्यवासिनी देवी ने कई क्षेत्रीय भाषाओं में अपने गायन कला का प्रदर्शन किया। उन्होंने मैथिली, भोजपुरी और मगही सहित कई भाषों में लोकगीतों को गया और विश्व स्तर पर बिहार की हर भाषा को उन्होंने एक नई पहचान दिलायी। उन्होंने शादी-विवाह ,छठ गीतों के अलावा कई तरह के गीतों को गाया है जो काफी प्रसिद्ध हुई है। विंध्यवासिनी देवी ने ऑल इंडिया रेडियो, पटना में लोक संगीत के निर्माता के रूप में कार्य किया है और इस क्षेत्र के उत्थान के लिए उन्होंने विंध्य कला मंदिर नामक संगीत संस्था की स्थापना की,जो भातखण्डे यूनिवर्सिटी लखनऊ से अंगीकृत है। अब इस संस्था का संचालन उनकी पुत्री पुष्पारानी मधु और पुत्र सुधीर कुमार सिन्हा कर रहे है।

अवार्ड और उपलब्धि
बिहार की बेहद प्रसिद्ध लोकगायिका विंध्यवासिनी देवी को बिहार कोकिला के नाम से भी जाना जाता है। उन्होंने लोकगायिकी के क्षेत्र में काफी नाम कमाया है और उन्होंने इस क्षेत्र में देश विदेश में नाम कमाया है। भारत सरकार ने उनकी इस उपलब्धि को देखते हुए वर्ष 1974 में पद्मश्री से सम्मानित किया। इसके अतिरिक्त विंध्यवासिनी देवी को वर्ष 1991 में संगीत नाट्य अकादमी से सम्मानित किया गया। वर्ष 1998 में मध्यप्रदेश सरकार ने उन्हें अहिल्याबाई सम्मान से सम्मानित किया। इसके अतिरिक्त विंध्यवासिनी देवी को कई बड़े सम्मान से भी सम्मानित किया जा चुका है।

 

विंध्यवासिनी देवी की मृत्यु
18 अप्रैल 2006 को पटना के कंकड़बाग में स्थित उनके आवास पर विंध्यवासिनी देवी का 86 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। पद्मश्री विंध्यवासिनी देवी ने बिहार के लोकगीतों को एक नयी पहचान दी है। वो वाकई बिहार की शान है और बिहार की पहचान है।

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