मुकेश सहनी को हल्के में लेना तेजस्वी को पड़ सकता है भारी

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पिछले साल लोकसभा चुनाव के प्रचार के दौरान बिहार में महागठबंधन का एक नारा बहुत लोकप्रिय हुआ था. वह नारा था “माछ-भात खाएंगे, महागठबंधन को जिताएंगे”. इस नारे के तहत बिहार भर में माछ-भात के भोज का आयोजन भी किया गया था. इस माछ-भात जैसे रोचक आयोजन का प्रस्ताव विकाशसील इंसान पार्टी के प्रमुख मुकेश साहनी ने दिया था. हालाँकि यह बात अलग है की इसका फायदा सिर्फ खाने वालों को हुआ खिलाने वालों को नहीं , क्यों की मोदी के नेतृत्व में NDA का राष्ट्रवाद बिहार में महागठबंधन के माछ-भात पर कहीं ज्यादा भारी पर गया.

बिहार में अक्टूबर-नवंबर में विधानसभा का चुनाव होना है. लेकिन कोरोना के कारण भारतीय राजनीती का केंद्र बिंदु रही बिहार के इतिहास में शायद ऐसा पहली बार हो रहा होगा की चुनाव इतना नज़दीक होने के बावजूद बिहार की सड़के राजनितिक माहौल से दूर है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं की कोरोना के संकट में बिहार राजनीती से दूर रहेगा. शायद बिहार और यहाँ नेताओं के लिए कोरोना उतनी बड़ी बीमारी नहीं है जितनी बड़ी बीमारी यहाँ की राजनीती है. क्यों की आज़ादी की लड़ाई से लेकर वर्तमान का इतिहास उठाकर देख लीजिये बिहार को आप राजनीती के बिना परिभाषित ही नहीं कर सकते.

कोरोना के कारण बिहार में अब वर्चुअल रैली का दौर शुरू हो चूका है. अब आपको हाथो में पार्टी का झंडा लिए कोई कार्यकर्ता तेज़ धुप में खड़ा नज़र नहीं आएगा, क्यों की अब वह हाथ में स्मार्ट फोन लेकर अपनी पार्टी के जित की हुंकार भरेगा. 5 जुलाई रविवार को विकासशील इंसान पार्टी के संयोजक मुकेश साहनी ने भी वर्चुवल रैली के द्वारा पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थको को सम्बोधित किया. अपने सम्बोधन में उन्होंने निषाद जाती के हितो की सुरक्षा ,बिहार में उनको आरक्षण दिलाने पर जोर दिया. उनके सम्बोधन से एक बात साफ थी की उनकी इस रैली का सबसे बड़ा मकसद निषाद जाती और इसकी सभी उपजातियों को विधानसभा चुनाव के लिहाज से एक साथ रखना है. इसके अलावे चुनाव नज़दीक होने के बावजूद महागठबंधन में किसी को भाव नहीं दे रही राजद को भी यह बताना था की VIP राजद के सहयोग के बिना भी चुनाव में उतरने के लिए तैयार है.

पर अब सवाल यही है की मुकेश साहनी के नेतृत्व में लगभग 2 साल पहले बनी विकासशील इंसान पार्टी का बिहार में कितनी ताकत है. क्या महागठबंधन के सहयोग के बिना VIP बिहार विधानसभा के चुनाव में दूसरे दलों को टक्कर दे पायेगी. इसके लिए हम थोड़ा पीछे चलते है 2019 अक्टूबर में जहाँ बिहार विधानसभा के 5 सीटों पर उपचुनाव हुए थे. VIP सिमरी बख्तियारपुर विधानसभा सीट पर महागठबंधन की तरफ से JDU के खिलाफ अपना उम्मीदवार उतरना चाहती थी. लेकिन राजद VIP को नज़रअंदाज़ कर ज़फर आलम को अपना उम्मीदवार बनाया. लेकिन राजद के इस फैसले से नाराज़ साहनी ने महागठबंधन में रहते हुए राजद के सामने अजय निषाद को अपना उम्मीदवार बनाया. एक ही गठबंधन के 2 उम्मीदवार होने के बावजूद भी राजद के ज़फर इस्लाम 71435 वोट मिले और साथ ही इस सीट पर जित भी. जबकि VIP इस सीट लगभग 25 हज़ार वोट ले कर तीसरे नंबर पर रही. शायद इसी चुनावी परिणाम से राजद अतिआत्मविस्वास की शिकार हो चुकी है और वह VIP को उतनी तरजीह अभी नहीं दे रही है.

पहली बार किसी चुनाव में अकेले लड़ी मात्र एक साल पुरानी पार्टी के लिए 25 हज़ार वोट पाना उतना खराब प्रदर्शन नहीं कहा जा सकता. साथ ही राजद को यह भी यद् रखना चाहिए की मल्लाह बिरादरी में दो दर्जन उपजातियां हैं और अनुमान के मुताबिक बिहार में करीब 10 फीसदी आबादी मल्लाहों की है. खासकर उत्तर बिहार में जहां नदियां अधिक हैं, वहां इनका वोट हार-जीत में बड़ा किरदार निभाता है. माना जाता है की VIP के आने से पहले इस जाती का सर्वाधिक समर्थन राजद को मिलता रहा है. लेकिन अब उनके पास भी विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) और मुकेश साहनी के रूप में अपनी पार्टी और अपना नेता मिला है, इसलिए उनको मुकेश साहनी से बहुत उम्मीदें हैं. मल्लाहों के लिए मुकेश साहनी सशक्तिकरण का प्रतीक बनकर उभरे हैं. मल्लाह समुदाय अति पिछड़ा समुदाय है ये काफी गरीब हैं. मल्लाहों में करोड़पति आपको ढूंढने से ही मिलेगा. लेकिन, मुकेश साहनी करोड़पति हैं और मल्लाहों के लिए यह गर्व की बात है. मुकेश यंग भी हैं और मछुआरों के अधिकारों को लेकर खुलकर अपनी बात रखते हैं.’दरभंगा, खगड़िया, मुज़फ़्फ़रपुर, मधुबनी और भागलपुर के कई क्षेत्र में मल्लाहों का वोट निर्णायक होता है. इसलिए इसमें कोई शक नहीं की मुकेश साहनी महागठबंधन की सफलता के लिए उतने ही जरुरी है जितनी की कांग्रेस और रालोसपा.

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