भारत का विस्मार्क जिसने राजाओं को ख़त्म किए बिना रजवाड़ों को मिटा दिया

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आज यानी 15 दिसंबर को सरदार बल्लभ भाई पटेल की पुण्यतिथि है. पीएम नरेंद्र मोदी ने सरदार बल्लभ भाई पटेल की 69वीं पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि दी उन्होंने ट्वीट करते हुए लिखा है कि राष्ट्र के लिए जो सेवा उन्होंने की है, हम उससे निरंतर प्रेरण लेते रहेंगे.
गौरतलब है कि आजादी के बाद सभी रियासतों को भारत के साथ जोड़ने में उनका बहुत बड़ा योगदान है और उन्हें लौह पुरुष के नाम से भी जाना जाता है.

बीबीसी हिंदी में सरदार पटेल पर प्रशाशित एक लेख में सरदार पटेल के जीवन के कई पहलुओं के बारे में बताया गया है जिसका कुछ अंश इस लेख में भी प्रकाशित किया जा रहा है…

पटेल की उपेक्षा

पटेल का क़द 5 फ़ीट 5 इंच था. नेहरू उनसे 3 इंच लंबे थे. पटेल की जीवनी लिखने वाले राजमोहन गांधी भारत के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को उद्धृत करते हुए कहते हैं, “आज भारत जो कुछ भी है, उसमें सरदार पटेल का बहुत योगदान है. लेकिन इसके बावजूद हम उनकी उपेक्षा करते हैं.”

उसी पुस्तक में राजमोहन गांधी खुद लिखते हैं, “आज़ाद भारत के शासन तंत्र को वैधता प्रदान करने में गाँधी, नेहरू और पटेल की त्रिमूर्ति की बहुत बड़ी भूमिका रही है. लेकिन ये शासन तंत्र भारतीय इतिहास में गांधी और नेहरू के योगदान को तो स्वीकार करता है लेकिन पटेल की तारीफ़ करने में कंजूसी कर जाता है.”

इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि सुनील खिलनानी की मशहूर किताब ‘द आइडिया ऑफ़ इंडिया’ में नेहरू का ज़िक्र तो 65 बार आता है जबकि पटेल का ज़िक्र सिर्फ़ 8 बार किया गया. इसी तरह रामचंद्र गुहा की पुस्तक ‘इंडिया आफ़्टर गाँधी’ में पटेल के 48 बार ज़िक्र की तुलना में नेहरू का ज़िक्र 4 गुना अधिक यानी 185 बार आया है.

सरदार और नेहरू की तुलना
पटेल के एक और जीवनीकार हिंडोल सेनगुप्ता उनकी जीवनी ‘द मैन हू सेव्ड इंडिया’ में लिखते हैं, “गाँधी की छवि एक असिंहक, चर्खा चलाने वाले और मानवीय भावनाओं से ओतप्रोत शख़्स की रही है. नेहरू शेरवानी के बटन में लाल गुलाब लगाए चाचा नेहरू के रूप में उभरते हैं जिन्हें किसी दूसरे शख़्स की पत्नी से रोमांस करने में कोई गुरेज़ नहीं है. इनकी तुलना में सरदार पटेल के जीवन में कोई रोमांस नहीं है (उनकी पत्नी का बहुत पहले देहांत हो गया था और उनके जीवन में किसी और महिला का ज़िक्र नहीं मिलता). पटेल एक ऐसे शख़्स हैं जो अपने बारे में और अपनी ज़रूरतों के बारे में बहुत कम बताते हैं.”

य़थार्थवादी पटेल
सरदार के एक और जीवनीकार पीएन चोपड़ा उनकी जीवनी ‘सरदार ऑफ़ इंडिया’ में रूसी प्रधानमंत्री निकोलाई बुलगानिन को कहते बताते हैं, “आप भारतीयों के क्या कहने! आप राजाओं को समाप्त किए बिना रजवाड़ों को समाप्त कर देते हैं.”

बुलगानिन की नज़र में पटेल की ये उपलब्धि बिस्मार्क के जर्मन एकीकरण की उपलब्धि से बड़ा काम था.

मशहूर लेखक एच वी हॉडसन लॉर्ड माउंटबेटन को कहते बताते हैं, “मुझे ये कहने में कोई संकोच नहीं कि अच्छा हुआ नेहरू को नए गृह मंत्रालय का प्रमुख नहीं बनाया गया. अगर ऐसा होता तो सब कुछ बिखर जाता. पटेल ने, जो कि यथार्थवादी है, ये काम कहीं बेहतर ढंग से किया.

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