RJD के साथ गठबंधन नहीं हुआ तो क्या करेंगे मांझी, कुशवाहा और सहनी !

ऐसा लगता है कि राष्ट्रीय जनता दल नेतृत्व पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी, पूर्व केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा और वीआईपी प्रमुख मुकेश सहनी को एक खास रणनीति के तहत भाव नहीं दे रहा है. पिछले लोकसभा चुनाव में राजद ने बांहें फैलाकर इन तीनों दलों के साथ गठबंधन किया था लेकिन नतीजे उम्मीदों के अनुरुप नहीं आएं और पहली बार ऐतिहासिक रुप से लोकसभा में राजद का कोई प्रतिनिधि नहीं पहुंचा.

तेजस्वी के नाम पर महागठबंधन एकमत ...

राजद नेतृत्व को ऐसा लगता है कि इन तीनों दलों से गठबंधन का कोई खास लाभ नहीं है. राजद इन तीनों पार्टियों के साथ गठबंधन करने से बेहतर मानता है कि कुशवाहा, मुसहर और मल्लाह समाज को उचित मात्रा में टिकट दिया जाए और इनके वोटरों को अपने पाले में ले आया जाए. ऐसी परिस्थिति में ये तीनों दल पैदल हो सकते हैं क्योंकि नीतीश कुमार तो एनडीए के पुराने सहयोगी लोजपा को ही भाव नहीं दे रहे हैं तो इन नए लोगों को अपने साथ लेने से रहें !

बिहार में पकने लगी सियासी खिचड़ी ...

वैसे मांझी के बारे में यह चर्चा चल रही है कि वो अपने दल का जदयू में विलय कर सकते हैं लेकिन सवाल है कि मांझी को जब विलय ही करना होगा तो जदयू में विलय क्यों करेंगे ? विलय की जब बात आएगी तो भाजपा से बेहतर विकल्प उनके लिए कुछ नहीं होगा क्योंकि एक पूर्व मुख्यमंत्री के लिए आगे का रास्ता केंद्र में मंत्री पद या फिर किसी राज्य का महामहिम यानी कि राज्यपाल का पद होगा और ये पद भाजपा में विलय से ही संभव है न कि जदयू में विलय से. मांझी के रुख को देखकर ऐसा नहीं लगता कि वो किसी भी दल में अपने दल का विलय करेंगे. यह सब कोरी बकवास भी हो सकती है.

Once highly influential, these 3 Bihar leaders now find no takers ...

ऐसे में संभावना यह भी है उपेंद्र कुशवाहा, मुकेश सहनी, जीतन राम मांझी मिलकर बिहार में एक नया मोरचा बना लें और इस मोरचे में पप्पू यादव और वामपंथी दल भी शामिल हो जाएं हालांकि वामपंथी दलां पर निगाह राजद की भी टिकी हुई है. इन दलों के बीच सरपंच की भूमिका में कांग्रेस है. खुद मांझी और उपेंद्र कुशवाहा लगातार कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के संपर्क में हैं. अब देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस नेतृत्व इन दलों के बीच तालमेल के लिए क्या रास्ता निकालता है !

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