रामविलास और चिराग क्यों खफा हैं इन दिनों ?

इन दिनों बिहार की राजनीति में किसी के तेवर सबसे ज्यादा सख्त चल रहे हैं तो वो हैं चिराग पासवान. जमुई के सांसद और लोक जनशक्ति पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष. चिराग की पार्टी वैसे तो एनडीए का हिस्सा है लेकिन बिहार की एनडीए सरकार को घेरने का वो कोई मौका हाथ से जाने नहीं देते. बिहार सरकार के लिए यह चिंता का विषय भी बन गया है. सत्ताधारी जनता दल यूनाइटेड के कई वरिष्ठ नेता और राज्य सरकार के मंत्री चिराग पासवान की बयानबाजी पर अपनी आपत्ति जता चुके हैं लेकिन उन कारणों को जानना बेहद जरुरी है जिसकी वजह से बिहार की नीतीश सरकार चिराग पासवान के रडार पर है.

सीट शेयरिंग से असंतुष्ट हैं चिराग

मीडिया के गलियारे में जो खबरें आ रही है, उसके मुताबिक नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यू 115 सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए अडिग है, जबकि सहयोगी भारतीय जनता पार्टी 105 सीटों पर चुनाव लड़ने को तैयार है. 115 और 105 मिलकर 220 सीट होते हैं. बिहार में विधानसभा की सीटें हैं 243.

बाकी बची 23 सीटों पर ही लोजपा को संतोष करना होगा. यही वजह है कि पासवान परिवार इन दिनों गठबंधन की तरह बेरुखी दिखा रहे हैं. लोजपा की सबसे बड़ी परेशानी यह है कि उनके लिए सिर्फ ऐसी सीटें छोड़ी जा रही है जो राजद और कांग्रेस जैसी पार्टियों की मजबूत सीटें हैं. ऐसे में उन्हें नागवार गुजरना लाजिमी है.

गठबंधन में रहकर खिलाफत कर चुके हैं पासवान

याद किजिए वर्ष 2005 के बिहार विधानसभा चुनाव को. रामविलास पासवान की पार्टी केंद्र की यूपीए 1 की सरकार में शामिल थी. इस सरकार में राजद भी शामिल थी. लालू प्रसाद और रामविलास पासवान दोनों ही इस सरकार में मंत्री थें. 2004 का लोकसभा चुनाव कांग्रेस, राजद और लोजपा ने मिलकर लड़ा था और शानदार जीत दर्ज की थी लेकिन साल भर बाद ही जब विधानसभा चुनाव हुए तो लोजपा ने राजद को छोड़कर अकेले चुनाव लड़ने का फैसला ले लिया. लोजपा को इसका फायदा भी मिला. शून्य सीटां वाली लोजपा को अकेले 29 सीटों पर जीत मिली. 60 के आसपास सीटों पर दूसरा स्थान मिला. बाकी सभी सीटों पर लोजपा को वोट भी जबर्दस्त तरीके से मिला.

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