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विदेशी सरजमीं पर शतक लगाने वाला पहला भारतीय, जिसके नाम पर खेली जाती है भारत की प्रतिष्ठित घरेलु टी20 टूर्नामेंट

Bihari News

बेखौफ बल्लेबाजी के जनक, जिसने 90 साल पहले कर दिया था टी20 क्रिकेट को परिभाषित

विदेशी सरजमीं पर शतक लगाने वाला पहला भारतीय, जिसके नाम पर खेली जाती है भारत की प्रतिष्ठित घरेलु टी20 टूर्नामेंट

5 दिन के टेस्ट को 1 डे की तरह खेलने वाला बल्लेबाज

गले में रुमाल बांधे, लंबे कद का यह खुशमिजाज खिलाड़ी जब बल्ला लेकर मैदान में आता था तो लोग ख़ुशी से झूम उठते थे. उस वक्त क्रिकेट भारत जैसे देश में फल फूल रहा था, यह आजादी से पहले का दौर था. आज जिस खिलाड़ी की बात करेंगे वह भारत के आधुनिक क्रिकेट नायकों के लिए एक आदर्श है. उन्हें देखने वाले बताते हैं कि, चाहे पहली गेंद हो या फिर आखिरी, वो अपने शॉट खेलने से नहीं चूकते थे. आज के बल्लेबाज जो शॉट खेलते हैं, उस खिलाड़ी ने वो उसी समय खेल कर दिखा दिया था. यह खिलाड़ी कहता था कि लोग यहां टिकट लेकर असाधारण क्रिकेट देखने आते हैं, और उन्हें ये देना हमारा ही काम है. दोस्तों, आप देख रहे हैं चक दे क्रिकेट की खास पेशकश चक दे क्लिक्स और आज के अंक में हम आपको भारत के एक महान खिलाड़ी के बारे में बताएंगे, जिन्हें भारत के आधुनिक क्रिकेट का जनक कहा जाता है. इन्हीं के नाम से भारत में घरेलु टी20 लीग सैयद मुश्ताक अली ट्रॉफी खेली जाती है.

चक दे क्रिकेट की टीम आपके लिए भारत के एक महान खिलाड़ी सैयद मुश्ताक अली के जीवन और क्रिकेट करियर से जुड़ी कुछ जानी अनजानी और अनकही बातें लेकर आया है. सैयद मुश्ताक अली का जन्म 17 दिसंबर, 1914 को मध्य प्रदेश के इंदौर में हुआ था. मुश्ताक अली को बचपन से ही क्रिकेट में अनहद दिलचस्पी थी लेकिन उनको क्रिकेट में लाने वाले थे कर्नल सीके नायुडू.
सैयद मुस्ताक अली अपने घर के पीछे खेलते थे, और कर्नल सीके नायुडू रोज ही उनको खेलते हुए देखा करते थे. सैयद मुश्ताक अली के पिता याकूब मुश्ताक अली खान उस वक्त SP थे, कर्नल सीके नायुडू से उनकी पहचान थी और वो घर से जब अपने स्कूटर पर निकलते थे, मुश्ताक अली के पिता को सलाम नमस्कार करके निकलते थे. एक सुबह जब कर्नल सीके नायुडू अपने स्कूटर से गुजर रहे थे, उन्होंने याकूब अली को सलाम तो कहा लेकिन आगे जाकर अपनी स्कूटर वापस घुमा ली. वो लौटकर याकूब अली के पास आए और बोले, “खान साब मैं आपके लड़के को हैदराबाद ले जाना चाहता हूं.” सैयद मुश्ताक अली कहते हैं, उन्हें क्रिकेट में लाने वाले कर्नल सीके नायुडू ही हैं, जो कुछ भी उन्होंने सीखा है, उन्हीं से सीखा है.

सैयद मुश्ताक अली हैदराबाद गए, और वहीं से सही मायने में उनके क्रिकेट जीवन की शुरुआत हुई थी. 5 जनवरी, 1934 वह दिन था, जब सैयद मुश्ताक अली ने अंतराष्ट्रीय क्रिकेट में अपना पदार्पण किया था. इंग्लैंड के विरुद्ध ईडन गार्डन्स में सैयद मुश्ताक अली ने अपना टेस्ट अंतराष्ट्रीय मैच खेला था. डेब्यू मैच की पहली पारी में मुश्ताक अली सिर्फ 9 रनों पर LBW हो गए थे दूसरी पारी में कप्तान सीके नायुडू ने उन्हें पारी की शुरुआत करने भेजा लेकिन मुश्ताक अली इस पोजीशन पर भी 18 रनों से ज्यादा नहीं बना पाए. हालांकि मुश्ताक अली ने अपने डेब्यू मैच में 1 विकेट भी चटकाया था. भारत और इंग्लैंड के बीच खेला गया वह मैच ड्रा हुआ था.


लेकिन साल 1936 में जब भारतीय टीम ने इंग्लैंड का दौरा किया था, मुश्ताक अली ने ओल्ड ट्रेफर्ड में खेले गए मुकाबले में शतक लगाकर नया कीर्तिमान रच दिया. विजय मर्चेंट के साथ पहले विकेट के लिए मुश्ताक अली ने 203 रनों की साझेदारी की और इस दौरान 112 रनों की पारी खेल डाली. इस तरह विदेशी धरती पर शतक लगाने वाले वो पहले भारतीय खिलाड़ी बने. इस शतक से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा भी है, जो बताता है कि मुश्ताक अली किस कद के बल्लेबाज थे. जब मुश्ताक अली नाइंटीज में थे, तब इंग्लैंड के कप्तान भागकर उनके पास आए और बोले, अब तुम शतक के करीब हो, संभलकर खेलो. मुश्ताक अली ने कहा, कोई दिक्कत नहीं है. इसके बाद उन्होंने 3 चौके लगाकर अपना शतक पूरा किया था. आप इसी से अंदाजा लगाइए कि सैयद मुश्ताक अली किस तरह के बल्लेबाज थे. इस शतक से मुश्ताक अली करोड़ों भारतीय क्रिकेटप्रेमियों के दिलों में बस गए.
क्रिकेट के जानकार सैयद मुश्ताक अली को भारतीय क्रिकेट का शेम्पेन कहते हैं. उनके खेलने का अंदाज पारंपरिक तरीके से बिलकुल अलग था. स्टेप आउट कर शॉट खेलना, बगल जाकर खेलना, जिसे आज इनिवेशन या इनोवेटिव तरीका कहते हैं, सैयद मुश्ताक अली रिस्क लेने से नहीं हिचकते थे, जो शॉट आज टी20 क्रिकेट में देखने को मिलते हैं, वो शॉट मुश्ताक अली उस वक्त टेस्ट क्रिकेट में खेलते थे.


1948-49 में वेस्टइंडीज के विरुद्ध कोलकाता में मुश्ताक अली के बल्ले से एक और शतक आया. वैसे तो मुश्ताक अली का क्रिकेटिंग करियर काफी लंबा रहा, जो 1930 से 1963-64 तक चला लेकिन इस बीच वो भारत के लिए सिर्फ 11 टेस्ट मैच ही खेले. मुश्ताक अली पर आरोप थे कि वो बोर्ड की बातों को नहीं मानते हैं, बोर्ड को बिना बताए कहीं भी चले जाते हैं. इसके अलावा उनपर गैलरीज के लिए खेलने के भी आरोप लगे. इन्हीं सब वजह से मुश्ताक अली के बोर्ड से मतभेद हुए और इसका खामियाजा मुश्ताक अली को भुगतना पड़ा, यही वजह थी कि उनका अंतराष्ट्रीय क्रिकेट करियर का ज्यादा लंबा ना हो पाया. मुश्ताक अली को क्रिकेट से इतना प्यार था कि वो बस खेलना चाहते थे. अंतराष्ट्रीय टीम से बाहर होकर उन्होंने खूब घरेलु क्रिकेट खेले. वो होलकर के अलावा महाराष्ट्र, सेंट्रल इंडिया, मध्य भारत, गुजरात, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की तरफ से खेले.

कलकत्ता के लोगों पर मुश्ताक अली की दीवानगी का आलम इस कदर था कि जब मुश्ताक अली को टीम से बाहर किया गया, तो वो जोर-जोर से नारे लगाने लगे ‘नो मुश्ताक, नो क्रिकेट.’ उस वक्त का एक किस्सा है, जो इसी प्रकरण से जुड़ा हुआ है. दलीप सिंह, जो उस वक्त सेलेक्शन कमिटी के चेयरमैन थे, तब भीड़ ने उनको कलकत्ता में घेर लिया था. एक शक्श ने भीड़ में उनकी टाई खींच दी थी, तब मुश्ताक अली उनको वहां से ले गए. तभी भीड़ ने नारा लगाना शुरू कर दिया ‘नो मुश्ताक, नो क्रिकेट.’ यानी अगर मुश्ताक नहीं खेलेंगे, तो हम यहां क्रिकेट नहीं होने देंगे. इसके बाद मुश्ताक अली खेले. लेकिन मुश्ताक ने 1947-48 ऑस्ट्रेलिया दौरे से अपना नाम वापस ले लिया. दरअसल, द्वितीय विश्व युद्ध में मुश्ताक अली के एक भाई की मृत्यु हो गई थी, जिसके बाद उन्होंने देश की तरफ से खेलने से साफ मना कर दिया.
37 साल की उम्र में मुश्ताक अली ने अपना 11वां और अंतिम टेस्ट अंतराष्ट्रीय खेला था, जो भारतीय टेस्ट क्रिकेट इतिहास के लिहाज से सबसे बड़ा दिन है. वह 1951-52 इंग्लैंड का भारत दौरा था, चेन्नई में खेले गए उस टेस्ट मैच में भारत ने पहली बार जीत दर्ज की थी. यह भारत की पहली टेस्ट जीत थी.
इस तरह दो ऐतिहासिक क्षणों ने भारतीय लोककथाओं में मुश्ताक का स्थान सुनिश्चित किया है. पहला जब वो ओवरसीज़ टेस्ट शतक लगाने वाले पहले भारतीय खिलाड़ी बने थे, दूसरा जब भारत ने पहली बार कोई टेस्ट मैच जीता था, जो मुश्ताक अली के इंटरनेशनल करियर का अंतिम टेस्ट था.

मुश्ताक अली और जुल्फिकार भुट्टो के दोस्ती के किस्से काफी मशहूर थे. भुट्टो उस वक्त बॉम्बे में रहते थे, और जब मुश्ताक अली मैच खेलने बोम्बे जाते थे, तो वो जुल्फिकार भुट्टो के घर ही ठहरते थे. भुट्टो भी मुश्ताक का मैच देखने स्टेडियम पहुंच जाते थे, फिर चाहे मैच कहीं भी हो. जब जुल्फिकार पाकिस्तान के राष्ट्रपति बन गए, तब उन्होंने मुश्ताक अली को एक बार कहा कि मुश्ताक अब तुम पाकिस्तान आ जाओ, तुम्हें जो पद चाहिए दूंगा, बस पाकिस्तान आकर रहो. इसपर मुश्ताक ने भुट्टो से कहा था ‘सुन जुल्फी (अपने दोस्त जुल्फिकार को मुश्ताक अली जुल्फी कहते थे) जो प्यार मुझे यहां भारत में मिला है, जो इंदौर में मिला है, मैं इसे छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगा. मैंने हमेशा हिंदुस्तान से प्यार किया है और इसे छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगा. आइन्दा से इस मसले पर मुझे मत बोलना.’

मुश्ताक अली ने भारत के लिए 11 टेस्ट मैचों की 20 पारियों में 612 रन बनाए हैं. इस दौरान उनके बल्ले से 2 शतक और 3 अर्धशतक निकले थे. इन 11 मैचों में मुश्ताक अली के नाम 3 विकेट भी दर्ज हैं. मुश्ताक अली ने 226 फर्स्ट क्लास मुकाबलों में 35.90 की औसत से 13,213 रन बनाए हैं. इस दौरान उन्होंने 30 शतक और 63 अर्धशतक बनाए हैं. बाले से शानदार प्रदर्शन के अलावा मुश्ताक ने 162 विकेट भी हासिल किए हैं.

मुश्ताक अली इंदौर में ही पढ़े लिखे और आगे की पढाई के लिए वो अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी गए थे. स्थानीय टीम और प्राइवेट क्लबों के लिए भी वो खूब खेले. वो सिर्फ एक दिग्गज खिलाड़ी ही नहीं थे बल्कि अपने समय के मशहूर सुपरस्टार थे और भारत के युवा जनरेशन के आइकॉन थे. दूसरे दिग्गज विजय मर्चेंट, जो कि थोड़ा संभलकर खेलते थे और मुश्ताक, जो बेखौफ होकर खेलते थे, दोनों की जोड़ी कमाल की थी. वो सालों तक अपनी टीम के लिए शानदार शुरुआत करते रहे और एक आदर्श ओपनिंग पेअर के रूप में खुद को स्थापित किया.


भारत सरकार ने साल 1964 में मुश्ताक अली को खेल के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया था. भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड यानी BCCI ने उनके नाम पर घरेलु टी20 सीरीज कराने का निर्णय लिया, 2008-09 सीजन इसका पहला सीजन था, सैयद मुश्ताक अली ट्रॉफी, भारत की घरेलु टी20 टूर्नामेंट है, जिसमें सभी रणजी टीम खेलते हैं. मुश्ताक अली की आत्मकथा ‘क्रिकेट डिलाइटफुल’ साल 1967 में छपी थी.
साल 2005 में सोते हुए 90 वर्षीय सैयद मुश्ताक अली की मौत हो गई. मुश्ताक के बेटे गुलरेज अली और उनके पोते अब्बास अली दोनों फर्स्ट क्लास क्रिकेट खेले.

सैयद मुश्ताक अली की सबसे खास बात ये रही कि उन्होंने सिर्फ खेलने से मतलब रखा, उन्होंने कभी टीम की परवाह नहीं की. भारत के लिए वो सिर्फ 11 टेस्ट ही खेले लेकिन इस बात का उनको कभी मलाल नहीं था. जब टीम इंडिया से बाहर किए गए, वजह जो भी रही हो, वो टूटे नहीं बल्कि घरेलु क्रिकेट को अपना लिया. घरेलु क्रिकेट में भी वो 10 से ज्यादा टीमों की तरफ से खेले. इसके अलावा वो कई स्थानीय टीमों और क्लबों के लिए खेले.

अगर एक चीज जो आज के जेनेरेशन को मुश्ताक अली से सीखनी चाहिए, वो है लोगों के लिए खेलना. दूसरी चीज जो इनोवेटिव स्ट्रोकप्ले की बात होती है, वो तो आज के बल्लेबाजों ने मुश्ताक से सीखी ही है. आपके अनुसार आज के क्रिकेटरों को मुश्ताक अली से क्या सीख लेनी चाहिए ? कमेंट में हमें जरुर बताएं.

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