Placeholder canvas

वह बिहारी जिसने नेपाल के संविधान में करवाया था संशोधन

Bihari News

बिहारी बेजोड़ के आज के सेगमेंट में बात एक ऐसे बिहारी के बारे में जो अपनी प्रतिभा के बदौलत देश में नहीं विदेश में बना उपराष्ट्रपति. यह अपनी प्रतिभा के बदौलत हमेशा आगे रहा. वह अपने बयानों की वजह से हमेशा मीडिया की सुर्खियों मे रहे हैं. इन्होंने नेपाल में हिंदी के सम्मान के लिए लड़ाई लड़ी है. इतना ही नहीं जब वे नेपाल के उपराष्ट्रपति बने तो इन्होंने मैथली भाषा में शपथ ग्रहण किया था. जिसको लेकर लंबे समय तक विवाद में रहे. अब तक आपको समझ में आ ही गया होगा कि हम बात करने जा रहे हैं परमानंद झा के बारे में

परमानंद झा बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे. इनका जन्म बिहार के दरभंगा जिले के गरौल के रहने वाले थे. इन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई मधुबनी से की थी. इन्होंने मैट्रिक की परीक्षा मधुबनी के खजौली हाईस्कूल से पास किया था उसके बाद इनका एडमिशन आरके कॉलेज में हुआ था. इसके बाद वे ग्रेजुएशन करने के लिए कानून की पढ़ाई करने के लिए नेपाल चले गये. उसके बाद हाइयर शिक्षा के लिए बेल्जियम चले गए. पढ़ाई खत्म होने के बाद इन्होने प्रैक्टिश शुरू किया जिसमें उन्हें एक पहचान मिली. इसके बाद वे सुप्रीम कोर्ट के जज बन गए. पमानंद झा यही नहीं रुके उन्होंने साल 2008 में नेपाल के उपराष्ट्रपति का चुनाव लड़ा जिसमें उन्हें जीत मिली और इस तरह से वे नेपाल के उपराष्ट्रपति बन गए.

परमानंद झा ने उपराष्ट्रपति का चुनाव मधेसी जन अधिकार फोरम के बैनर तले लड़ा था जिसमें उन्होंने माओवादी पार्टी की शांता श्रेष्ठ, नेपाली कांग्रेस के मान बहादुर और UML की लक्ष्मी शाक्या को इस चुनाव में हराया था. चुनाव जीतने के साथ ही परमानंद झा चर्चा में आ गए थे. लेकिन मीडिया की सुर्खियों में तब और आ गए जब उन्हें नेपाल के राष्ट्रपति ने उप राष्ट्रपति पद के लिए शपथ दिलवाना शुरू किया तो परमानंद झा ने अनुरोध किया कि उन्हें हिंदी में शपथ दिलवायी जाए. फिर क्या था परमानंद झा के इस शब्द के बाद विवाद शुरू हो गया. झा पर नेपाली संविधान को न मानने का आरोप लगा. इतना ही इनके विरोधी लगातार विरोध जारी रखे. तो झा भी अपनी बातों पर अड़े रहे. इसके बाद यह पूरा मामला नेपाल की सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया. जहां से फैसला आया कि संविधान के अनुसार सवैधानिक पद के लिए केवल नेपाली भाषा में ही शपथ ली जा सकती है. और उन्होंने परमानंद झा को यह आदेश दिया कि वे नेपाली भाषा में फिर से शपथ लें. लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. जिसके विरोध में माओवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने नेपाली संसद को छह महीने तक चलने ही नहीं दिया. जिसके कारण उपराष्ट्रपति का पद निष्क्रिय रह गया. हालांकि बाद के दिनों में नेपाल के संसद में एक संसोधन प्रस्ताव पारित किया गया जिसमें यह बताया गया कि राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति नेपाली या अपनी मातृभाषा में शपथ ले सकते हें. इस पूरी प्रक्रिया को होने में लगभग 2 साल का समय गुजर गया और साल 2010 में परमानंद झा ने मैथिली में उपराष्ट्रपति पद के लिए शपथ लिए.

परमानंद झा नेपाल में राष्ट्रपति पद के लिए शपथ ले रहे थे और इधर बिहार के गरौल में ढोल नगाड़े बज रहे थे. और विश्व के मानचित्र पर दरभंगा अपनी एक अलग पहचान बना रहा था. आपको जानकर आश्चर्य होगा परानंद झा चार भाई है जिसमें सबसे बड़े हैं परमानंद झा जबकि सबसे छोटे बाई धनानंद झा बताते हैं कि वे आज भी हसनचक में साईकिल की एक दुकान चलाते हैं जिससे उनका घर परिवार किसी तरह से चलता है.

परमानंद झा की पारिवारिक पृष्ठभूमि को देखें तो उनका नेपाल से पुराना रिश्ता रहा है. परमानांद झा के दादा जी मिथिलांचल के मशहूर पहलवान थे. जब वे पहलवानी करते थे अच्छे अच्छ पहलवानों को उन्होंने पछाड़ दिया था. उनकी पहलवानी के चर्चे उस समय नेपाल तक था. उनकी पहलवानी के किस्से सुनकर उस समय के नेपाल के राजा ने शंकर झा को अपने राज दरबार में बुलाया था और सेान में प्रधान पद की नौकरी दी थी. इतना ही नहीं पहलवान शंकर सिंह से खुश होकर सप्तरी जिले में बहुत जमीन उन्हें दे दी थी. तब से ही परमानंद झा के परिजन नेपाल में रहते हैं.

Leave a Comment